अमेरिका-ईरान वार्ता विफल: ट्रंप की हॉर्मुज़ नाकेबंदी रणनीति पर सवाल
अमेरिका-ईरान वार्ता विफल होने के बाद ट्रंप की होर्मुज़ नाकेबंदी रणनीति पर सवाल उठे। विशेषज्ञों ने इसे आत्मघाती बताया और कूटनीति की आवश्यकता पर जोर दिया।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई वार्ता विफल हो गई। दोनों देशों के बीच बातचीत में किसी भी मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी, जिसके बाद स्थिति और गंभीर हो गई है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जो फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नाकेबंदी से स्थिति सुधरने के बजाय और जटिल हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार यह कदम “असमंजसपूर्ण और आत्मघाती” हो सकता है, जिससे अमेरिकी सेनाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा। अमेरिका में एक सर्वे के मुताबिक लगभग 80 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि यह जलमार्ग खुला रहे ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति सुचारू बनी रहे, जबकि केवल 10 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अमेरिका ने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए हैं।
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इज़राइल के नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ ने कहा कि नाकेबंदी से ईरान को झुकाने की संभावना कम है, क्योंकि ईरान ने अब तक मजबूत प्रतिरोध दिखाया है।
दूसरी ओर, अमेरिका में यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन को कूटनीति का रास्ता अपनाना चाहिए। लेकिन डेमोक्रेटिक सीनेटर टिम केन ने कहा कि यह आसान नहीं होगा क्योंकि अमेरिका पहले ही 2015 के परमाणु समझौते से बाहर निकल चुका है।
वार्ता के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने “अंतिम और सर्वोत्तम” प्रस्ताव दिया था, लेकिन ईरान ने उसे स्वीकार नहीं किया। वहीं ईरान ने अमेरिका पर “अतार्किक मांगों” का आरोप लगाया और कहा कि अमेरिका को अपना “तानाशाही रवैया” छोड़ना होगा।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने कहा कि सम्मान और निष्पक्षता से ही समझौता संभव है।
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