लगातार दो पीएसएलवी मिशन विफल होने का इसरो के लिए क्या मतलब है? | विश्लेषण
लगातार दो पीएसएलवी मिशनों में आई तकनीकी गड़बड़ियों ने इसरो की विश्वसनीयता और वाणिज्यिक रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तीसरे चरण की विफलता को लेकर।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए पीएसएलवी को लंबे समय से एक भरोसेमंद “वर्कहॉर्स” रॉकेट माना जाता रहा है। इसकी सफलता दर इतनी मजबूत रही है कि इसे वाणिज्यिक प्रक्षेपणों के लिए भी आक्रामक रूप से पेश किया जा रहा है। हालांकि, हाल के घटनाक्रमों ने इस भरोसे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार दो पीएसएलवी मिशनों में आई विफलताओं ने इसरो के सामने तकनीकी और रणनीतिक दोनों तरह की चुनौतियां पैदा कर दी हैं।
18 मई 2025 को पीएसएलवी-सी61 मिशन का असफल होना इसरो के लिए एक दुर्लभ झटका था। इसके बाद 12 जनवरी 2026 को पीएसएलवी-सी62 मिशन में भी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हो पाया। श्रीहरिकोटा से सुबह 10.17 बजे प्रक्षेपण के लगभग 50 मिनट बाद, इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने पुष्टि की कि रॉकेट के तीसरे चरण (पीएस3) में तकनीकी गड़बड़ी देखी गई है। उन्होंने बताया कि इस चरण के प्रदर्शन का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा और उसके बाद विस्तृत जानकारी साझा की जाएगी।
पीएसएलवी का तीसरा चरण एक ठोस ईंधन मोटर है, जिसे तकनीकी रूप से परिपक्व और अत्यंत विश्वसनीय माना जाता है। यही कारण है कि इस चरण में आई समस्या ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है। आमतौर पर ऐसे परिपक्व सिस्टम में बार-बार विफलता की संभावना बेहद कम मानी जाती है।
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लगातार दो मिशनों में आई समस्याएं ऐसे समय में सामने आई हैं, जब इसरो पीएसएलवी को अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक बाजार में एक प्रमुख प्रक्षेपण विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। इससे न केवल इसरो की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है, बल्कि भविष्य के वाणिज्यिक अनुबंधों पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।
अब इसरो के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इन विफलताओं के मूल कारणों की पहचान कर, तकनीकी सुधारों के साथ जल्द से जल्द भरोसा बहाल करे। आने वाले विश्लेषण और सुधारात्मक कदम यह तय करेंगे कि पीएसएलवी अपनी “वर्कहॉर्स” की छवि को बनाए रख पाता है या नहीं।