नफरत भरे भाषण को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि संवैधानिक क्षति माना जाए: याचिकाकर्ताओं की सुप्रीम कोर्ट से अपील
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से नफरत भरे भाषण को ‘संवैधानिक क्षति’ मानने की मांग की, कहा कि यह भेदभावपूर्ण है और मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं और धार्मिक नेताओं ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि नफरत भरे भाषण (हेट स्पीच) को केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक “संवैधानिक क्षति” (Constitutional Tort) के रूप में मान्यता दी जाए। उनका तर्क था कि हेट स्पीच का स्वभाव मूल रूप से भेदभावपूर्ण होता है और यह संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों की जड़ों पर सीधा प्रहार करता है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इन याचिकाओं में देश में बढ़ते नफरत भरे भाषणों पर गंभीर चिंता जताई गई है और ऐसे धार्मिक आयोजनों को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई है, जहां इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष दलील दी कि हेट स्पीच केवल सार्वजनिक शांति भंग करने का मामला नहीं है, बल्कि यह समानता, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता है। उनका कहना था कि यदि राज्य या उसके एजेंट ऐसे भाषणों को रोकने में विफल रहते हैं, तो इसे संविधान के उल्लंघन के रूप में देखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने “संवैधानिक क्षति” की अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा कि यह एक ऐसा न्यायिक उपाय है, जिसके तहत राज्य को अपने अधिकारियों या एजेंटों के कृत्यों के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, यदि उनके कार्यों या निष्क्रियता से संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है।
उनका यह भी कहना था कि केवल दंडात्मक या पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि हेट स्पीच के पीड़ितों को प्रभावी संवैधानिक राहत मिलनी चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में नफरत भरे भाषणों से निपटने के कानूनी ढांचे को नई दिशा दे सकता है।
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