दुनियाभर में कंपनियां तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं, लेकिन कर्मचारियों पर इसे जबरन लागू करना कई जगह उल्टा असर दिखा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी तकनीक को अपनाने और उसे मजबूरी में लागू करने के बीच बड़ा अंतर होता है, जिसे कंपनियां नजरअंदाज कर रही हैं।
कार्यालयों में काम करने का तरीका हमेशा समय के साथ बदलता रहा है, लेकिन पिछले 30 वर्षों में बदलाव की रफ्तार इतनी तेज रही कि कर्मचारियों को स्थिर होने का मौका ही नहीं मिला। पहले कागजी फाइलों का इस्तेमाल होता था, फिर डेस्कटॉप आए, उसके बाद लैपटॉप और अब स्मार्टफोन ने लगभग सभी काम आसान बना दिए हैं।
साल 2007 के आसपास जब कर्मचारियों को ब्लैकबेरी और लैपटॉप जैसे उपकरण दिए गए, तो उन्हें बोझ नहीं बल्कि एक सुविधा और प्रगति के रूप में देखा गया। यह एक तरह का स्टेटस सिंबल भी बन गया था, क्योंकि हर किसी के पास ये सुविधाएं नहीं थीं। जो कर्मचारी कहीं से भी ईमेल का जवाब दे सकते थे या ऑफिस के बाहर रहकर काम कर सकते थे, उन्हें अधिक सक्षम माना जाता था।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन उपकरणों को अपनाने के लिए किसी पर दबाव नहीं डाला गया था। यह एक विकल्प था, जिसे कर्मचारियों ने अपनी जरूरत और लाभ के अनुसार अपनाया।
इसके विपरीत, आज कई कंपनियां एआई को अनिवार्य बना रही हैं। इससे कर्मचारियों में असंतोष और तनाव बढ़ रहा है। बिना उचित प्रशिक्षण और समझ के एआई लागू करने से उसकी प्रभावशीलता भी कम हो जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को एआई को एक सहयोगी साधन के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि एक बाध्यता के रूप में, तभी इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।
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