दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की उस याचिका पर विचार करे, जिसमें उसने अपनी 40 वर्षों से अधिक समय से साथ रह रही लिव-इन पार्टनर और उनके बच्चों के नाम पारिवारिक पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पेंशन भुगतान आदेश (पीपीओ) में शामिल करने की मांग की है। अदालत ने कहा कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति को पारिवारिक पेंशन और अन्य वैधानिक लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने इस मामले में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के वर्ष 2018 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें संबंधित अधिकारियों द्वारा कर्मचारी की मासिक पेंशन और ग्रेच्युटी के 50 प्रतिशत हिस्से को रोके जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था। कर्मचारी वर्ष 2012 में सेवानिवृत्त हुआ था।
मामले के अनुसार, संबंधित सरकारी कर्मचारी पर यह आरोप लगाया गया था कि उसने अपनी लिव-इन पार्टनर और उनके दो बच्चों के लिए राजनयिक पासपोर्ट हासिल किया था, जिसके चलते उसके पेंशनरी लाभों का एक हिस्सा रोक दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि इस आधार पर पेंशन या ग्रेच्युटी को स्थायी रूप से रोकने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है।
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से साथ रह रहा है और उसके पारिवारिक संबंध स्थापित हैं, तो ऐसे मामलों में बच्चों और साथी के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी की याचिका पर नए सिरे से निर्णय ले।
यह फैसला लिव-इन संबंधों से जुड़े सामाजिक और कानूनी अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर उन मामलों में जहां बच्चों और आश्रितों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न हो।
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