आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने शहरी भूमि उपयोग से जुड़ी गंभीर चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाते हुए देश के बड़े शहरों की ज़मीन को “डेड कैपिटल” करार दिया है। यह सर्वेक्षण गुरुवार, 29 जनवरी 2026 को जारी किया गया। सर्वे के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में भूमि का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक गतिविधियों में योगदान देने में असमर्थ है, जिससे विकास की संभावनाएं सीमित हो रही हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि आर्थिक शब्दावली में “डेड कैपिटल” ऐसे परिसंपत्तियों को कहा जाता है, जो उत्पादक पूंजी के रूप में कार्य नहीं कर पातीं। ये परिसंपत्तियां कानूनी, नियामकीय बाधाओं या बाज़ार की अक्षमताओं के कारण अर्थव्यवस्था को गति देने में नाकाम रहती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कई शहरों में भूमि इसी श्रेणी में आ गई है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने इसके प्रमुख कारणों के रूप में कड़े भूमि-उपयोग नियमों, भूमि स्वामित्व से जुड़े अस्पष्ट शीर्षकों (लैंड टाइटल), और खंडित भूमि बाज़ारों का उल्लेख किया है। इसके अलावा, अटकलों पर आधारित निवेश प्रवृत्तियां भी भूमि के प्रभावी पुनर्चक्रण (लैंड रीसाइक्लिंग) में बाधा बन रही हैं, जिससे शहरी भूमि का समुचित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
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सर्वे में यह भी संकेत दिया गया है कि भूमि उपयोग पर अनावश्यक प्रतिबंध और कानूनी अनिश्चितता न केवल रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे के विकास को प्रभावित करती है, बल्कि रोजगार सृजन और शहरी सुविधाओं के विस्तार में भी रुकावट बनती है।
आर्थिक सर्वेक्षण का मानना है कि यदि शहरी भूमि का बेहतर नियोजन, स्पष्ट स्वामित्व व्यवस्था और बाज़ार सुधार किए जाएं, तो यह “डेड कैपिटल” उत्पादक पूंजी में बदली जा सकती है। इससे न केवल शहरों में आवास, परिवहन और बुनियादी ढांचे में सुधार होगा, बल्कि समग्र आर्थिक वृद्धि को भी बल मिलेगा।
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