असम में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (स्पेशल रिवीजन) की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नामों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने और कथित तौर पर झूठी आपत्तियों के आरोपों के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य के बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के खिलाफ तीखी बयानबाज़ी की है। उन्होंने खुले तौर पर कहा कि “मियास लोगों के लिए मुश्किलें पैदा करना” उनका काम है और यदि “हमें जिंदा रहना है तो अगले 30 वर्षों तक ध्रुवीकरण की राजनीति करनी होगी।”
मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी उस समय आई है जब असम में मतदाता सूची के दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया विवादों में घिर गई है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नामों के खिलाफ आपत्तियां दाखिल की गईं, जिनमें कई मामलों में यह दावा किया गया कि संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है या वह स्थायी रूप से उस मतदान केंद्र क्षेत्र से स्थानांतरित हो चुका है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि यह एक सुनियोजित प्रयास है, जिसके तहत बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं को अंतिम मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है।
इन आरोपों के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने स्वीकार किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ताओं ने उनकी ओर से निर्देश मिलने पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य “मियास लोगों को परेशान करना” है। ‘मियास’ शब्द का इस्तेमाल असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए अपमानजनक संदर्भ में किया जाता रहा है।
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विपक्ष ने मुख्यमंत्री के इस बयान को लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक हथियार बनाकर एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं, सत्तारूढ़ दल का तर्क है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना ज़रूरी है।
यह पूरा विवाद असम की राजनीति में ध्रुवीकरण, पहचान और मताधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।
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