प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनी। इनमें सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास को लेकर हुआ समझौता सबसे ज्यादा चर्चा में है। रणनीतिक विशेषज्ञ इसे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और चीन की समुद्री रणनीति के जवाब के तौर पर देख रहे हैं।
सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में स्थित है और इसकी भौगोलिक स्थिति इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। यह पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। मलक्का जलडमरूमध्य एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच व्यापार का प्रमुख रास्ता है।
चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। चीन अपनी लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए मलक्का मार्ग पर निर्भर है। इसी वजह से इसे चीन की आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
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भारत और इंडोनेशिया के बीच सबांग पोर्ट के विकास से भारतीय नौसेना की रणनीतिक पहुंच इस क्षेत्र में मजबूत हो सकती है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से सबांग पोर्ट की दूरी भी काफी कम है, जिससे भारत को हिंद महासागर में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने में मदद मिलेगी।
सबांग पोर्ट की एक बड़ी खासियत इसका प्राकृतिक रूप से गहरा समुद्री क्षेत्र है। यहां बड़े जहाजों के रुकने, ईंधन भरने और मरम्मत जैसी सुविधाओं के विकास की संभावनाएं हैं। इससे भारत के समुद्री व्यापार को भी फायदा मिल सकता है।
भारत के चेन्नई, विशाखापत्तनम और कोलकाता जैसे बंदरगाहों से दक्षिण-पूर्व एशिया जाने वाले जहाजों के लिए सबांग एक महत्वपूर्ण ट्रांसशिपमेंट हब बन सकता है। इससे समय और लॉजिस्टिक्स लागत कम होने की उम्मीद है।
राजनयिक दृष्टि से भी यह समझौता अहम माना जा रहा है। इंडोनेशिया लंबे समय से तटस्थ विदेश नीति अपनाता रहा है, लेकिन भारत के साथ सहयोग बढ़ाकर उसने क्षेत्रीय संतुलन में अपनी भूमिका को मजबूत किया है।
भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के तहत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। सबांग पोर्ट समझौता इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अंडमान-निकोबार और सबांग पोर्ट मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार और सुरक्षा के नए केंद्र के रूप में उभर सकते हैं। यह समझौता भारत की समुद्री रणनीति को नई दिशा देने वाला कदम साबित हो सकता है।
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