भारत ऐसे समय में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, जब दुनिया दो बड़े युद्धों और तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों से गुजर रही है। ईरान युद्ध का भारत पर ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और नागरिकों के स्तर पर गंभीर असर पड़ा है।
ब्रिक्स में इस बार 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश हिस्सा ले रहे हैं। खास बात यह है कि ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब, जो ईरान युद्ध से जुड़े प्रमुख पक्ष हैं, ब्रिक्स के सदस्य हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत ईरान और यूएई के बीच किसी तरह की शांति या समझ की पहल कर सकता है?
ईरान और यूएई के बीच मतभेदों का असर ब्रिक्स पर भी पड़ा है। सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका और भारत को अध्यक्ष के तौर पर अलग बयान जारी करना पड़ा।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच बिश्केक में हुई मुलाकात को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत के लिए ईरान रणनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम है। ईरान भारत का महत्वपूर्ण कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए चाबहार बंदरगाह भी महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर, यूएई भारत का बेहद महत्वपूर्ण खाड़ी साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष, आतंकवाद-रोधी सहयोग और श्रम क्षेत्र में व्यापक संबंध हैं। यूएई में करीब 40 लाख भारतीय रहते और काम करते हैं।
भारत की मध्यस्थता की संभावना को दोनों पक्षों से समर्थन के संकेत भी मिले हैं। पूर्व यूएई राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी की क्षेत्र में विश्वसनीयता भारत को मध्यस्थ की भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी भारत की रचनात्मक भूमिका की संभावना जताई है।
भारत के पास मध्यस्थता का ऐतिहासिक अनुभव भी है। 1953 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ और ऑस्ट्रिया के बीच मध्यस्थता की थी। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए पश्चिम एशिया में शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने का अवसर बन सकता है।
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