भारत ने सोमवार, 31 अगस्त को सिंधु जल संधि को लेकर तथाकथित मध्यस्थता अदालत (सीओए) के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने अदालत को ‘अवैध रूप से गठित’ बताते हुए कहा कि उसे भारत के संप्रभु फैसलों पर निर्णय देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला अभी प्रभावी है। यह कदम 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद उठाया गया था, जिसमें 26 लोगों की जान गई थी। भारत ने पाकिस्तान के लगातार सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए कई कड़े कदमों की घोषणा की थी।
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि विश्व बैंक द्वारा गठित तथाकथित मध्यस्थता अदालत का गठन संधि की शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन है। भारत ने इस निकाय के पिछले सभी फैसलों को भी खारिज किया है।
मंत्रालय के मुताबिक, भारत ने इस मध्यस्थता अदालत को कभी कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी और लगातार उसका रुख रहा है कि इस निकाय की स्थापना ही सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। इसी कारण भारत कभी इस अदालत के समक्ष पेश नहीं हुआ और उसके पहले के फैसलों पर भी कोई संज्ञान नहीं लिया।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि अदालत की वर्तमान या भविष्य की कोई भी टिप्पणी भारत द्वारा अपनी परियोजनाओं के संबंध में किए जा रहे कार्यों को प्रभावित नहीं करेगी। मंत्रालय ने दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का निर्णय जारी रहेगा।
वहीं, मध्यस्थता अदालत ने अपने बयान में कहा कि उसने संधि की मौजूदा स्थिति और भारत द्वारा इसे स्थगित रखने के फैसले को ध्यान में रखा है। अदालत ने भारत द्वारा दिए गए संधि निलंबन के कारणों की भी समीक्षा की, लेकिन उन्हें संधि को स्थगित या समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
अदालत के अनुसार, सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह प्रभावी है और भारत को इसके तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए। इसमें पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और संचालन से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं।
हालांकि, भारत ने अदालत के इस निष्कर्ष को मानने से इनकार कर दिया है और अपनी संप्रभु कार्रवाई पर उसके अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह नकार दिया है।