कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सत्र अदालतों को यह अधिकार नहीं है कि वे किसी हत्या के दोषी को “प्राकृतिक जीवन के अंत तक” आजीवन कारावास की सजा सुनाएं। यह टिप्पणी अदालत ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसकी पृष्ठभूमि वर्ष 2017 की एक जघन्य हत्या से जुड़ी है।
प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन पक्ष) ने हाईकोर्ट को बताया कि अप्रैल 2017 में आरोपी ने शिकायतकर्ता के बच्चे की हत्या कर दी थी। शिकायतकर्ता एक मठ का भक्त और नियमित आगंतुक था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने कथित रूप से घृणा की भावना के चलते इस वारदात को अंजाम दिया। इस मामले में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी गई थी, जिसके दौरान यह कानूनी प्रश्न उठा कि सत्र अदालत की सजा देने की सीमा क्या है।
हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि भारतीय कानून के तहत आजीवन कारावास का अर्थ सामान्यतः दोषी के पूरे जीवनकाल से होता है, लेकिन “प्राकृतिक मृत्यु तक जेल में रखने” जैसा विशेष निर्देश केवल संवैधानिक या उच्च न्यायालयों के विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र में आता है। सत्र अदालतें इस तरह का प्रतिबंधात्मक आदेश पारित नहीं कर सकतीं।
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