दिल्ली हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने के नियम को सही ठहराया
दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति की सुरक्षा संबंधी नियमों को वैध माना। दुर्व्यवहार और देखभाल में कमी साबित होने पर जिला मजिस्ट्रेट उत्तराधिकारियों को बेदखल कर सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि वरिष्ठ नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार और उनकी उचित देखभाल नहीं करने की स्थिति में जिला मजिस्ट्रेट उनके बेटे, बेटी या कानूनी उत्तराधिकारी को उनकी संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है। अदालत ने दिल्ली माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण नियम, 2009 के तहत इस अधिकार को वैध माना है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि 2009 के नियमों के नियम 22(3)(1)(i) और (iv) वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के दायरे में हैं। अदालत के अनुसार, इन प्रावधानों का आधार केवल अधिनियम की धारा 32 नहीं है, बल्कि धारा 22 भी है, जिसके तहत राज्य सरकार को वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने का प्रावधान है।
अदालत ने यह टिप्पणी पूनम नाम की एक बहू की याचिका खारिज करते हुए की। पूनम ने अपनी सास की संपत्ति खाली करने के लिए संभागीय आयुक्त द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति से बेदखली की कार्यवाही और भरण-पोषण की मांग अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि वरिष्ठ नागरिक ने पहले भरण-पोषण के लिए आवेदन किया हो।
मामला पति-पत्नी के विवाद से जुड़ा था। बहू ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत साझा घर में रहने का अधिकार मांगा था। बाद में उसकी सास ने 2009 के नियमों के तहत बेदखली की कार्यवाही शुरू की।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम और घरेलू हिंसा अधिनियम को सामंजस्यपूर्ण तरीके से समझना होगा। महिला का साझा घर में रहने का अधिकार वरिष्ठ नागरिक के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार पर स्वतः हावी नहीं हो सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता सरकारी शिक्षिका थीं, उनकी पर्याप्त आय थी और बहादुरगढ़ में उनका अलग मकान भी था। हाईकोर्ट ने संभागीय आयुक्त के बेदखली आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
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