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यूरोपीय संघ का कार्बन टैक्स अस्वीकार्य, निर्यात लागत बढ़ा रहा है: जयराम रमेश

कांग्रेस ने ईयू के कार्बन टैक्स को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि इससे भारतीय निर्यात महंगा होगा और प्रस्तावित भारत-ईयू एफटीए में इस गैर-शुल्क बाधा का समाधान जरूरी है।

कांग्रेस ने गुरुवार (1 जनवरी, 2026) को यूरोपीय संघ (ईयू) के कार्बन टैक्स के कारण भारत के निर्यात पर बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई और कहा कि इस महीने के अंत तक होने की संभावना वाले भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) में इस “अस्वीकार्य” गैर-शुल्क बाधा (नॉन-टैरिफ बैरियर) को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि लंबे समय से प्रतीक्षित भारत-ईयू एफटीए को इस महीने के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की खबर है। उन्होंने The Indian Witness पर लिखा कि गुरुवार (1 जनवरी, 2026) से 27 देशों वाले यूरोपीय संघ को भारतीय इस्पात और एल्युमीनियम निर्यातकों को ईयू के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) के तहत कार्बन टैक्स देना होगा।

जयराम रमेश के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में ईयू को भारत के इस्पात और एल्युमीनियम निर्यात का औसत मूल्य 5.8 अरब डॉलर रहा, जो इससे पहले के वर्ष में 7 अरब डॉलर था। उन्होंने कहा कि ईयू आयातकों ने सीबीएएम लागू होने की तैयारी शुरू कर दी थी, जिसके कारण निर्यात पहले ही घट गया।

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उन्होंने थिंक-टैंक जीटीआरआई के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि कई भारतीय निर्यातकों को अपने उत्पादों की कीमतों में 15 से 22 प्रतिशत तक कटौती करनी पड़ सकती है, ताकि ईयू के आयातक उस मार्जिन का इस्तेमाल कार्बन टैक्स चुकाने में कर सकें।

जयराम रमेश ने यह भी कहा कि सीबीएएम के तहत कार्बन उत्सर्जन की सटीक गणना और रिपोर्टिंग से जुड़ी कड़ी दस्तावेजी आवश्यकताएं भारतीय निर्यातकों की लागत को और बढ़ा रही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि भारत-ईयू एफटीए पर अंततः हस्ताक्षर होते हैं, तो उसमें इस अस्वीकार्य गैर-शुल्क बाधा का समाधान जरूर होना चाहिए, ताकि भारतीय निर्यातकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

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