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रोहिंग्या समुदाय के लिए घर नाम की कोई जगह नहीं: विस्थापन का बढ़ता संकट

रोहिंग्या म्यांमार से नागरिकता न मिलने और हिंसा के कारण पलायन कर रहे हैं। पड़ोसी देश उन्हें स्थायी संरक्षण नहीं देते, जिससे उनका विस्थापन और असुरक्षा लगातार बढ़ रही है।

रोहिंग्या समुदाय के लिए आज भी “घर” जैसी कोई सुरक्षित जगह मौजूद नहीं है। जिस देश में वे जन्मे, वहीं उन्हें अपना नागरिक मानने से इनकार करता है, और पड़ोसी देश भी उन्हें अपनाने से कतराते हैं। इसी कारण रोहिंग्या दुनिया के सबसे अधिक संवेदनशील और असुरक्षित विस्थापित समुदायों में से एक बन चुके हैं।

पिछले कुछ वर्षों में हजारों रोहिंग्या म्यांमार से लगातार पलायन कर रहे हैं, विशेषकर 25 अगस्त को पश्चिमी म्यांमार में हुई हिंसा के बाद से। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने उन्हें “जबरन विस्थापित किए गए सबसे संवेदनशील समूहों में से एक” के रूप में सूचीबद्ध किया है। एजेंसी के अनुसार, सोमवार तक कुल 87,000 रोहिंग्या बांग्लादेश पहुंच चुके हैं, जहां वे अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं।

रोहिंग्या कौन हैं?
रोहिंग्या एक जातीय समूह है, जिसमें अधिकांश मुस्लिम हैं और वे मुख्य रूप से पश्चिमी म्यांमार के रखाइन प्रांत में रहते थे। उनकी भाषा बंगाली की एक बोलचाल आधारित बोली है, जबकि म्यांमार में आमतौर पर बर्मी भाषा बोली जाती है। यही सांस्कृतिक और भाषाई अंतर भी म्यांमार में उन्हें “अन्य” के रूप में देखे जाने का एक बड़ा कारण है।

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क्या वे म्यांमार के नागरिक हैं?
म्यांमार सरकार रोहिंग्या को आधिकारिक नागरिक नहीं मानती। उन्हें “विदेशी घुसपैठिए” कहा जाता है, जबकि रोहिंग्या दावा करते हैं कि वे सदियों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं। नागरिकता न मिलने के कारण वे शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य सेवाओं और आवाजाही जैसे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित हैं।

रोहिंग्या के लिए न म्यांमार सुरक्षित है, न ही पड़ोसी देश उन्हें स्थायी आश्रय देते हैं। इस कारण वे लगातार पलायन, हिंसा, भेदभाव और अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं — उनके लिए सचमुच “घर” नाम की कोई जगह बची ही नहीं है।

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