भ्रष्टाचार कानून की धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट में मतभेद, आंकड़ों में मामलों में बढ़ोतरी लेकिन सजा से ज्यादा बरी
सुप्रीम कोर्ट में धारा 17A पर मतभेद के बीच आंकड़े बताते हैं कि भ्रष्टाचार के मामले बढ़े हैं, लेकिन लंबित मुकदमों और बरी होने की संख्या सजा से कहीं अधिक है।
भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17A को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मतभेद के बीच सामने आए आंकड़े बताते हैं कि देश में भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है, लेकिन इसके बावजूद दोषसिद्धि की तुलना में बरी होने के मामले अधिक हैं। बीते मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर विभाजित फैसला सुनाया।
धारा 17A के तहत किसी भी लोक सेवक के खिलाफ, उसके आधिकारिक कार्यों और दायित्वों के निर्वहन के दौरान लिए गए फैसलों या की गई सिफारिशों से जुड़े कथित अपराध की जांच से पहले केंद्र या राज्य सरकार अथवा सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान भ्रष्टाचार की जांच में बाधा बनता है और इससे दोषियों को संरक्षण मिलता है, जबकि सरकार का कहना है कि यह ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए जरूरी है।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1988 से अब तक राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के मामलों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ी है। इसी अवधि में आरोपपत्र दाखिल किए जाने की संख्या आठ गुना तक बढ़ गई है, जो यह दर्शाता है कि जांच एजेंसियां पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हुई हैं। हालांकि, लंबित मामलों की संख्या में नौ गुना तक वृद्धि हुई है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर भारी दबाव साफ दिखाई देता है।
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सबसे अहम तथ्य यह है कि इन मामलों में सजा की दर अपेक्षाकृत कम बनी हुई है। बड़ी संख्या में आरोपी अंततः अदालतों से बरी हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी सुनवाई, प्रक्रियात्मक जटिलताएं, पूर्व अनुमति की बाध्यता और सबूतों की कमजोर कड़ियां इसके प्रमुख कारण हैं।
सुप्रीम कोर्ट में धारा 17A पर मतभेद इस बहस को और तेज कर सकता है कि क्या यह प्रावधान भ्रष्टाचार से लड़ने में सहायक है या फिर जांच और अभियोजन की राह में रुकावट। आने वाले समय में इस मुद्दे पर बड़ा फैसला देश की भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।
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