निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण, संसद के कानून बनने तक के लिए था फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर उसका फैसला केवल अस्थायी व्यवस्था थी, जो संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक संवैधानिक रिक्तता को भरने के लिए दिया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े अपने महत्वपूर्ण फैसले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि यह निर्णय केवल एक संवैधानिक रिक्तता को भरने के उद्देश्य से दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक के लिए यह व्यवस्था लागू की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके पूर्व निर्णय में भारत के मुख्य न्यायाधीश को निर्वाचन आयुक्तों के चयन पैनल में शामिल करने का उद्देश्य केवल नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और संतुलन सुनिश्चित करना था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने किसी विशेष ढांचे या प्रणाली को स्थायी रूप से लागू करने का निर्देश नहीं दिया था।
न्यायालय के अनुसार, संविधान में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर संसद को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है और अदालत ने उसी संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान करते हुए अंतरिम समाधान प्रस्तुत किया था।
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यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई थीं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम व्यवस्था के तहत प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति में शामिल करने का फैसला सुनाया था।
अब अदालत के ताजा स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया है कि अंतिम निर्णय और स्थायी व्यवस्था संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून पर निर्भर करेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक संस्थाओं की संवैधानिक सीमाओं और संसद की विधायी शक्तियों को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
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