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वंदे मातरम् अनिवार्य करने पर विवाद, जमीयत और AIMPLB ने कहा– आस्था और संविधान पर हमला

वंदे मातरम् के सभी अंतरे अनिवार्य करने के MHA आदेश पर जमीयत और AIMPLB ने धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान का उल्लंघन बताते हुए विरोध किया और अदालत में चुनौती देने की घोषणा की।

गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा फरवरी 2026 में जारी उस अधिसूचना पर नया विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और आधिकारिक आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरे गाने को अनिवार्य करने की बात कही गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। उनका कहना है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में किसी भी धार्मिक भावना से जुड़े तत्व को अनिवार्य बनाना सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा है।

गृह मंत्रालय का यह निर्देश ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं जयंती के अवसर पर जारी किया गया है। इस आदेश के अनुसार, राष्ट्रपति या अन्य उच्च अधिकारियों की उपस्थिति वाले कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले पूरे गीत का 3 मिनट 10 सेकंड का संस्करण गाया जाएगा। पहले केवल इसके शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाते थे।

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AIMPLB के महासचिव मौलाना मोहम्मद फज़लुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि गीत के चौथे और पांचवें अंतरे में देवी दुर्गा की स्तुति का उल्लेख है, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद के सिद्धांत से टकराता है। उन्होंने इसे पूरी तरह अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि देशभक्ति किसी पर थोपने से नहीं आती।

विरोध करने वाले संगठनों ने संविधान सभा के 1950 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें केवल पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया था ताकि सांप्रदायिक तनाव से बचा जा सके। दोनों संगठनों ने इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग करते हुए अदालत में चुनौती देने की बात कही है।

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