कक्षा 8 की एनसीईआरटी की न्यायपालिका से जुड़े अध्याय को लेकर जारी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने उन तीन शिक्षाविदों को ब्लैकलिस्ट करने संबंधी अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है, जो इस अध्याय की तैयारी में शामिल थे। अदालत ने सरकारी और सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों में इन शिक्षाविदों की भागीदारी पर लगाया गया प्रतिबंध भी हटा दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने यह फैसला प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिया। इन शिक्षाविदों ने 11 मार्च 2026 के आदेश को वापस लेने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकारें इन शिक्षाविदों को किसी भी शैक्षणिक कार्य में शामिल करने को लेकर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकती हैं। अदालत ने अपने पुराने आदेश में की गई उस टिप्पणी को भी हटा दिया, जिसमें कहा गया था कि शिक्षाविदों ने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिश की थी।
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सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि मार्च का आदेश शिक्षाविदों को सुने बिना पारित किया गया था। उन्होंने बताया कि अध्याय किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि सामूहिक रूप से तैयार किया गया था। वहीं वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि अध्याय का उद्देश्य छात्रों को न्यायपालिका की वास्तविक चुनौतियों से परिचित कराना था।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि पुस्तक की कुछ सामग्री अनुचित और अनावश्यक थी। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि केंद्र सरकार ने सामग्री की समीक्षा के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की है। एनसीईआरटी पहले ही अध्याय में “अनुचित सामग्री” होने पर माफी मांग चुकी है और किताब को दोबारा लिखने की बात कह चुकी है।
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