नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब की वजह को लेकर वैज्ञानिकों की जांच जारी है। शुरुआती तौर पर इसे ग्लेशियल झील के फटने यानी जीएलओएफ से जोड़कर देखा गया था, लेकिन अब इस संभावना को खारिज कर दिया गया है। अधिकारियों को प्रभावित मार्ग पर तिब्बत में किसी ग्लेशियल झील के फटने के प्रमाण नहीं मिले हैं।
नेपाल सेंटर फॉर डिजास्टर मैनेजमेंट के अध्यक्ष विशाल नाथ उप्रेती के अनुसार, वैज्ञानिक अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि कहीं बड़े पैमाने पर चट्टान और बर्फ गिरने से यह विनाशकारी घटना तो नहीं हुई। घटनास्थल बेहद दुर्गम होने के कारण वैज्ञानिक अभी वहां पहुंच नहीं सके हैं और फिलहाल उपग्रह तस्वीरों की मदद से घटनाक्रम को समझने की कोशिश की जा रही है।
शुरुआत में यह भी माना गया था कि भूकंप के कारण चट्टान और बर्फ का विशाल हिस्सा घाटी में गिरा होगा। हालांकि, अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (यूएसजीएस) से मिली जानकारी के आधार पर उप्रेती ने बताया कि घटनाक्रम इसके उलट हो सकता है। उनके मुताबिक बड़े पैमाने पर चट्टान और बर्फ गिरने से भूकंपीय हलचल पैदा हुई। शुरुआती तौर पर भूकंप की तीव्रता 4.2 बताई गई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 5.2 किया गया।
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उप्रेती ने बताया कि बाढ़ के बाद 5,000 से अधिक लोगों के मारे जाने या लापता होने की सूचना है। उन्होंने आशंका जताई कि यह संख्या बढ़कर 7,000 से 10,000 तक पहुंच सकती है।
घटना के करीब तीन घंटे बाद एक और भूस्खलन हुआ, जिससे अस्थायी बांध बन गया। बाद में बांध टूटने से अपेक्षाकृत छोटी बाढ़ आई।
वैज्ञानिकों की एक नई परिकल्पना यह है कि पहाड़ का विशाल चट्टानी हिस्सा खिसका और उसके ऊपर मौजूद बर्फ भी उसके साथ नीचे आ गई। यह सामान्य ग्लेशियल झील फटने की घटना से अलग प्रक्रिया होगी।
हालांकि, वैज्ञानिक अभी इस सिद्धांत को अंतिम निष्कर्ष नहीं मान रहे हैं। घटनास्थल पर प्रत्यक्ष अध्ययन के बाद ही बाढ़ के वास्तविक कारण की पुष्टि हो सकेगी। उपग्रह तस्वीरों और भू-आकृति में हुए बदलावों के अध्ययन से जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है।
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