पटना उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग छात्र की अवैध गिरफ्तारी के मामले में बिहार पुलिस के रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने इस गंभीर लापरवाही और कानून के उल्लंघन के लिए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित 15 वर्षीय छात्र को ₹5 लाख का मुआवजा दे। नाबालिग छात्र को दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया था, जिसे अदालत ने पूरी तरह से गैरकानूनी करार दिया।
यह फैसला न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति रितेश कुमार की खंडपीठ ने दिया। अदालत नाबालिग छात्र के परिजनों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि छात्र को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए गिरफ्तार किया गया और उसे लंबे समय तक हिरासत में रखा गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी नाबालिग के साथ कानून के तहत विशेष सावधानी बरतना अनिवार्य है। किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी कर पुलिस ने न केवल कानून का उल्लंघन किया, बल्कि एक छात्र के मौलिक अधिकारों का भी हनन किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की गिरफ्तारी और हिरासत अंतिम उपाय होनी चाहिए, न कि सामान्य प्रक्रिया।
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मामले के अनुसार, 15 वर्षीय छात्र को 23 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उसे लगातार दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया, जबकि कानून के तहत उसे किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। अदालत ने इसे पुलिस की गंभीर चूक और संवेदनहीनता बताया।
पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़ित छात्र को ₹5 लाख का मुआवजा दे, ताकि उसके साथ हुई मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षति की कुछ हद तक भरपाई हो सके। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संबंधित पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
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