“आस्था इस बात पर निर्भर नहीं करती कि विज्ञान क्या कहता है, बल्कि यह भीतर की श्रद्धा पर आधारित होती है,” यह कहना है राजिंदर सिंह का, जो पटियाला से आए एक समूह के साथ दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (DJJS) के आश्रम-सह-डेरे में मौजूद हैं।
हालांकि, इस पूरे मामले में विज्ञान की भी अहम भूमिका रही है।
करीब बारह साल पहले क्लिनिकली मृत घोषित किए गए DJJS के संस्थापक आशुतोष महाराज आज भी अपने भक्तों के लिए ‘जीवित’ हैं। 29 जनवरी 2014 से उन्हें नूरमहल स्थित आश्रम में एक विशेष कक्ष में माइनस 22 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा गया है। संस्थान और उनके अनुयायियों का मानना है कि आशुतोष महाराज की मृत्यु नहीं हुई, बल्कि वे ‘गहन समाधि’ या ‘डीप मेडिटेशन’ में चले गए हैं और भविष्य में वे पुनः लौटेंगे।
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बुधवार से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दो दिवसीय समाधि कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए DJJS आश्रम पहुंच रहे हैं। ये सभी संस्थान के संस्थापक को श्रद्धांजलि अर्पित करने आए हैं, जिनके बारे में भक्तों का अटूट विश्वास है कि वे अभी भी ध्यानावस्था में हैं।
इन 12 वर्षों के दौरान आश्रम और डेरे की गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं। भक्तों की संख्या में भी इजाफा हुआ है, जो इस विश्वास के साथ यहां आते हैं कि उनके गुरु एक दिन समाधि से बाहर आएंगे। आश्रम प्रबंधन का कहना है कि महाराज का शरीर वैज्ञानिक तरीकों से संरक्षित है और उनकी स्थिति पूरी तरह ‘मेडिटेटिव स्टेट’ में है।
यह मामला लंबे समय से विवाद और बहस का विषय रहा है, जहां एक ओर विज्ञान उन्हें मृत मानता है, वहीं दूसरी ओर आस्था उन्हें जीवित मानकर नमन करती है। DJJS आश्रम आज भी इसी विश्वास के सहारे चलता आ रहा है और हर साल 29 जनवरी को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ यहां उमड़ती है।
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