सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) 16 फरवरी को एक याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि भारत का नया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 (Digital Personal Data Protection Act 2023) नागरिकों के सूचना का अधिकार (Right to Information Act, RTI) को कमजोर कर रहा है। याचिका में कहा गया है कि यह कानून निजता के अधिकार का “हथियार” बना कर सार्वजनिक सूचना तक नागरिकों की पहुंच को सीमित करता है।
यह याचिका मानवाधिकार और पारदर्शिता कार्यकर्ता वेंकटेश नायक (Venkatesh Nayak) ने दायर की है, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर (Vrinda Grover) कर रही हैं। याचिका में चुनौती दी गई है कि DPDP एक्ट की धारा 44(3) ने RTI एक्ट में संशोधन किया है, जिससे सार्वजनिक अधिकारियों को यह आधार देने का अधिकार मिल गया है कि मांगी गई जानकारी “व्यक्तिगत” प्रकृति की है।
इसका असर यह हुआ कि सरकारी संस्थाओं से जानकारी प्राप्त करना कठिन हो गया है। याचिका में कहा गया है कि यह नागरिकों के पारंपरिक अधिकारों और सरकारी जवाबदेही पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
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सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस सूर्यकांत (Surya Kant) करेंगे, इस याचिका पर सुनवाई करेगी। न्यायालय इस मामले में यह तय करेगा कि क्या DPDP एक्ट नागरिकों के RTI अधिकार को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है और क्या इसे संविधान के मूल अधिकारों के तहत चुनौती दी जा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस मामले का फैसला डिजिटल डेटा संरक्षण और सूचना के अधिकार के संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण नजीर कायम कर सकता है।
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