सुप्रीम कोर्ट सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें राज्य-नियंत्रित मंदिरों के पुजारियों, ‘सेवक’ और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्तों की समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का आग्रह किया गया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच इस जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई करेगी, जिसे अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर किया है। याचिका के माध्यम से केंद्र और राज्यों से निर्देश मांगे गए हैं कि वे न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाकर पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के वेतन व अन्य लाभों की समीक्षा करें।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि पुजारी और मंदिर कर्मचारी 2019 के वेतन संहिता की धारा 2(क) के तहत ‘कर्मचारी’ माने जाएं। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब राज्य मंदिरों का प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय नियंत्रण संभालता है, तब नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध बनता है और सम्मानजनक वेतन न देना जीवन यापन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।
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अप्रैल 2024 में वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में ‘रुद्राभिषेक’ के बाद उपाध्याय को पता चला कि पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन यापन के लिए न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता।
याचिका में बताया गया कि हाल ही में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों और कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। कई मंदिरों में पुजारी केवल ‘दक्षिणा’ पर निर्भर हैं, और तमिलनाडु के ‘दंडायुधपानी स्वामी मंदिर’ में फरवरी 2025 में आए एक सर्कुलर ने उन्हें भुखमरी की स्थिति में डाल दिया।
याचिकाकर्ता ने केंद्र और राज्यों से पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के कल्याण के लिए उपयुक्त कदम उठाने का भी अनुरोध किया है, जैसा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पहले दिए गए निर्णयों में कहा था।
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