सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देशभर में राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनावों में “फ्रीबी” वितरण पर कड़ी टिप्पणी की और ऐसे उपायों के सार्वजनिक वित्त पर पड़ने वाले दबाव को लेकर गंभीर चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बड़े पैमाने पर फ्रीबी योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय सरकारों को अच्छी तरह से योजनाबद्ध नीतियां पेश करनी चाहिए, जो लोगों के जीवन को सुधारें, जैसे कि संरचित बेरोजगारी सहायता कार्यक्रम।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “राष्ट्र की आर्थिक प्रगति इस तरह के उदार वितरण से प्रभावित होगी। हां, यह राज्य का कर्तव्य है कि वह प्रदान करे। लेकिन जो फ्रीबी का आनंद ले रहे हैं… क्या इसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए?” उन्होंने आगे कहा, “राज्यों में घाटा हो रहा है लेकिन फिर भी फ्रीबी दी जा रही है। देखिए, आप साल में 25 प्रतिशत राजस्व जमा करते हैं, तो इसे राज्य के विकास में क्यों नहीं लगाया जा सकता?”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह चिंता किसी एक राज्य के लिए नहीं है, बल्कि पूरे देश के सभी राज्यों पर लागू होती है। न्यायमूर्ति ने कहा, “हम किसी एक राज्य की बात नहीं कर रहे हैं, यह सभी राज्यों के लिए है। यह नियोजित व्यय है। क्यों न आप बजट प्रस्ताव बनाएं और यह बताएं कि यह लोगों की बेरोजगारी पर मेरा खर्च है।”
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यह टिप्पणियां तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन बनाम संघ सरकार मामले की सुनवाई के दौरान आईं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि फ्रीबी किसी विशेष राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया कि राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए कल्याणकारी उपायों के रूप में फ्रीबी पर अधिक निर्भर हो रही हैं, जिससे राज्यों के वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
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