सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम को राहत देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें छात्रा आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने और यह राशि अधिकारियों की सैलरी से वसूलने का निर्देश दिया गया था।
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी की इतिहास स्नातक और छात्र एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत में लिए जाने से जुड़ा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति की हिरासत रद्द करते हुए 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। अदालत ने यह राशि गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम और मामले में शामिल अन्य अधिकारियों की सैलरी से वसूलने को कहा था।
मेधा रूपम ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिरासत का फैसला कई प्रशासनिक स्तरों और प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद लिया गया था, इसलिए केवल डीएम को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने भी हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाए।
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जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाते हुए मेधा रूपम की याचिका पर नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।
कौन हैं मेधा रूपम?
मेधा रूपम 2014 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और गौतम बुद्ध नगर की पहली महिला जिलाधिकारी हैं। आगरा में जन्मीं मेधा ने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक किया और 2014 की यूपीएससी परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 10 हासिल की थी। नोएडा से पहले वह उत्तर प्रदेश के कई जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं।
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