तमिलनाडु में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच विरोध तेज हो गया है। शनिवार को राज्य के करीब 21 सांसदों ने एकजुट होकर मांग की कि लोकसभा की कुल 543 सीटों की संख्या में कोई बदलाव न किया जाए और तमिलनाडु की मौजूदा 39 संसदीय सीटें भी बरकरार रखी जाएं।
यह बैठक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने परिसीमन की संभावित प्रक्रिया और राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व पर इसके असर पर चर्चा के लिए बुलाई थी। हालांकि, द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (द्रमुक), अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (अन्नाद्रमुक) और उनके कुछ सहयोगी दल बैठक में शामिल नहीं हुए।
दक्षिण भारत के कई राज्यों में आशंका है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर परिसीमन से लोकसभा सीटों का मौजूदा वितरण बदल सकता है। तमिलनाडु के नेताओं का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को प्रभावी ढंग से लागू किया है, उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व के रूप में इसकी सजा नहीं मिलनी चाहिए।
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संसद में तमिलनाडु की स्थिति सुरक्षित रहनी चाहिए
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा कि यह मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि तमिलनाडु के अधिकार और संसद में उसके प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि राज्य की संसद में भूमिका कम नहीं होनी चाहिए।
चिदंबरम ने कहा कि उनकी मांग स्पष्ट है—लोकसभा की कुल 543 सीटें बरकरार रहें और तमिलनाडु के लिए 39 सीटों की गारंटी दी जाए। उन्होंने बताया कि बैठक में शामिल दोनों सदनों के करीब 21 सांसद इस बात पर सहमत थे कि राज्य के मौजूदा हिस्से में बदलाव नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस सांसद ज्योतिमणि ने भी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि परिसीमन तमिलनाडु के साथ-साथ देश के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है और इसे रोका जाना चाहिए।
कांग्रेस सांसद प्रवीण चक्रवर्ती ने द्रमुक और अन्नाद्रमुक की अनुपस्थिति पर निराशा जताई। कांग्रेस सांसद विष्णु प्रसाद ने भी चेतावनी दी कि परिसीमन लागू होने पर तमिलनाडु की संसद में आवाज और प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
बैठक में शामिल नेताओं ने स्पष्ट किया कि वे लोकसभा सीटों की कुल संख्या या तमिलनाडु के हिस्से में किसी भी बदलाव के पक्ष में नहीं हैं।
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