उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जाट समुदाय एक बार फिर राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। राज्य की कुल आबादी में जाटों की हिस्सेदारी करीब 2 प्रतिशत है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव चुनावी नतीजों को बदल सकता है।
जाट समुदाय का करीब 99 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 26 जिलों में केंद्रित है। ये जिले 136 विधानसभा और 27 लोकसभा सीटों को कवर करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, जाट 35 से 40 विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर नतीजे प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, जबकि करीब 50 सीटों पर उनका व्यापक प्रभाव माना जाता है।
परंपरागत रूप से जाटों का समर्थन राष्ट्रीय लोक दल (RLD) के साथ रहा है। हालांकि, पिछले वर्षों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत की है। इसके बावजूद RLD अभी भी जाटों के बीच महत्वपूर्ण समर्थन रखता है।
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चुनाव दर चुनाव बदला जाटों का रुझान
2007 के विधानसभा चुनाव में 61 प्रतिशत जाट मतदाताओं ने RLD का समर्थन किया था, जबकि BJP+ को करीब 18 प्रतिशत वोट मिले। BSP को 10, समाजवादी पार्टी को 8 और कांग्रेस को 2 प्रतिशत जाट वोट मिले।
2012 में RLD को 45 प्रतिशत जाट वोट मिले। BSP को 16 प्रतिशत, कांग्रेस को 11 प्रतिशत और BJP तथा SP को सात-सात प्रतिशत वोट मिले। उस चुनाव में RLD और कांग्रेस गठबंधन में थे।
2017 में BJP के उभार के साथ जाट राजनीति में बड़ा बदलाव आया। BJP ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 126 में से 100 सीटें जीतीं, जबकि RLD केवल एक सीट जीत सका।
2022 में RLD ने SP के साथ गठबंधन किया। किसान आंदोलन के बाद BJP के खिलाफ जाट नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश हुई। BJP ने पश्चिमी यूपी में 85 सीटें जीतीं, जबकि SP-RLD गठबंधन को 41 सीटें मिलीं। RLD ने आठ सीटें जीतीं।
2027 में किसके साथ जाएंगे जाट?
BJP ने जाट समर्थन मजबूत करने के लिए जयंत चौधरी के नेतृत्व वाले RLD को NDA में शामिल किया है। पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर भी जाट समुदाय को बड़ा राजनीतिक संदेश दिया।
अब 2027 में टिकट बंटवारे, जाट नेताओं को प्रतिनिधित्व और BJP-RLD गठबंधन की रणनीति पर काफी कुछ निर्भर करेगा। सवाल यही है कि BJP-RLD जाटों के बीच अपनी पकड़ बनाए रख पाएगा या SP-कांग्रेस गठबंधन फिर से इस समुदाय का समर्थन हासिल कर सकेगा।
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