संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधिकारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) से खुद को अलग कर लिया। यह फैसला ऐसे समय में लागू हुआ है, जब पिछले एक वर्ष से लगातार चेतावनियां दी जा रही थीं कि अमेरिका का यह कदम न केवल घरेलू बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर नुकसानदायक साबित हो सकता है। अमेरिका ने कहा कि यह निर्णय कोविड-19 महामारी के दौरान संयुक्त राष्ट्र की इस स्वास्थ्य एजेंसी के प्रबंधन में कथित विफलताओं को दर्शाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2025 में अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के पहले ही दिन एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से डब्ल्यूएचओ से बाहर निकलने की सूचना दी थी। अमेरिका के स्वास्थ्य और विदेश विभाग की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि अमेरिका अब केवल सीमित स्तर पर डब्ल्यूएचओ के साथ संपर्क बनाए रखेगा, ताकि औपचारिक रूप से संगठन से अलग होने की प्रक्रिया पूरी की जा सके।
एक वरिष्ठ सरकारी स्वास्थ्य अधिकारी ने स्पष्ट किया कि अमेरिका न तो पर्यवेक्षक के रूप में संगठन से जुड़े रहने की योजना बना रहा है और न ही भविष्य में दोबारा इसमें शामिल होने का कोई इरादा है। अमेरिका ने यह भी कहा कि वह अब बीमारी निगरानी और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं पर अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बजाय सीधे अन्य देशों के साथ काम करेगा।
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हालांकि, इस फैसले को लेकर विवाद भी सामने आया है। अमेरिकी कानून के अनुसार, संगठन छोड़ने से पहले एक वर्ष की सूचना देना और करीब 26 करोड़ डॉलर की बकाया सदस्यता राशि का भुगतान करना अनिवार्य था। अमेरिकी विदेश विभाग ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि भुगतान को लेकर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। वहीं, स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग ने घोषणा की कि डब्ल्यूएचओ को दी जाने वाली सभी अमेरिकी फंडिंग समाप्त कर दी गई है।
इस बीच, जिनेवा स्थित डब्ल्यूएचओ मुख्यालय के बाहर से अमेरिकी झंडा हटा लिया गया, जो अमेरिका के आधिकारिक अलगाव का प्रतीक माना जा रहा है। अमेरिका हाल के हफ्तों में अन्य संयुक्त राष्ट्र संगठनों से भी दूरी बना रहा है, जिससे पूरी संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
अमेरिका के बाहर निकलने से डब्ल्यूएचओ गंभीर वित्तीय संकट में आ गया है। संगठन को अपने प्रबंधन ढांचे में कटौती करनी पड़ी है और बजट घटाने के साथ-साथ इस वर्ष के मध्य तक लगभग एक चौथाई कर्मचारियों की छंटनी की तैयारी की जा रही है। अमेरिका अब तक डब्ल्यूएचओ का सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है, जो कुल फंडिंग का लगभग 18 प्रतिशत देता था।
वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम दुनिया की स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकता है। उनका कहना है कि इससे महामारी की पहचान, रोकथाम और प्रतिक्रिया से जुड़े वैश्विक सहयोग पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
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