सरकार की ओर से यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर शुल्क लगाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। इसी बीच एक विश्लेषण में सामने आया है कि पिछले पांच वर्षों में यूपीआई लेनदेन के मूल्य में वृद्धि की रफ्तार लगातार धीमी हुई है, जबकि जनता के पास मौजूद नकदी की वृद्धि तेज हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 से यूपीआई लेनदेन के कुल मूल्य में वृद्धि दर लगातार कम होती गई है। हालांकि, मौजूदा समय में यूपीआई लेनदेन की वृद्धि दर अभी भी जनता के पास मौजूद नकदी की वृद्धि दर से अधिक है। लेकिन दोनों के बीच का अंतर लगातार घट रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बदलाव को अर्थव्यवस्था की बढ़ती गतिविधियों के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिल सकता है कि अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों का स्तर आधिकारिक मुद्रास्फीति के आंकड़ों में दिखाई देने की तुलना में अधिक हो सकता है।
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यूपीआई ने पिछले कुछ वर्षों में भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों तक, डिजिटल भुगतान के लिए यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसके बावजूद नकदी की मांग और इस्तेमाल में भी तेजी दिखाई दे रही है।
विश्लेषण ऐसे समय सामने आया है जब यूपीआई से जुड़े संभावित एमडीआर शुल्क को लेकर चर्चा तेज है। एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले कारोबारियों से भुगतान सेवा से जुड़े पक्षों को मिलता है। यूपीआई पर शुल्क लगाने का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है।
आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि डिजिटल भुगतान के विस्तार के बावजूद नकदी अर्थव्यवस्था से पूरी तरह बाहर नहीं हुई है। यूपीआई और नकदी दोनों के रुझानों का अंतर कम होना आने वाले समय में भुगतान व्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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