पंजाब की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक ग्रामीण खेल कबड्डी की दुनिया अब नकदी, अपराध और गैंगवार के साए में आ चुकी है। मोहाली के सोहाना में 15 दिसंबर को एक भरे-पूरे कबड्डी टूर्नामेंट के दौरान प्रमोटर कंवर दिग्विजय सिंह उर्फ ‘राणा बलाचौरिया’ की गोली मारकर हत्या ने इस खेल से जुड़े उस मिथक को तोड़ दिया कि कबड्डी अब भी सिर्फ मिट्टी और गांवों तक सीमित है।
बताया गया कि शूटर दर्शक बनकर टूर्नामेंट में पहुंचे थे और मौके का फायदा उठाकर वारदात को अंजाम दिया। यह हत्या कबड्डी के तेजी से एक 100 करोड़ रुपये के उद्योग में तब्दील होने की एक और कड़ी मानी जा रही है। आज कबड्डी केवल खेल नहीं, बल्कि बड़े नकद इनामों, भारी-भरकम प्रायोजन, अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट और सट्टेबाजी से जुड़ा कारोबार बन चुकी है।
इस बदलती तस्वीर में हर रेड और हर टैकल के पीछे करोड़ों रुपये का दांव छिपा होता है। इसी के साथ आपराधिक गिरोहों की दिलचस्पी भी बढ़ी है। सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड जैसे बड़े अपराध और लॉरेंस बिश्नोई गैंग जैसे नाम भी अब इस ‘कबड्डी इकोसिस्टम’ से जोड़े जा रहे हैं, जहां पैसा, प्रभाव और वर्चस्व की लड़ाई खेल के मैदान तक पहुंच चुकी है।
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कभी गांवों की गलियों और मिट्टी के अखाड़ों में खेली जाने वाली कबड्डी अब संगठित आयोजनों, विदेशी दौरों और करोड़ों की कमाई का जरिया बन गई है। लेकिन इसके साथ ही हिंसा, धमकियों और हत्याओं का बढ़ता सिलसिला इस खेल की आत्मा पर सवाल खड़े कर रहा है।
राणा बलाचौरिया की हत्या ने साफ कर दिया है कि पंजाब की इस लोकप्रिय ‘ग्रामीण’ खेल परंपरा में अब दांव सिर्फ अंक या जीत का नहीं, बल्कि जान का भी लगने लगा है।
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