सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत जमानत से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। अदालत ने यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंपते हुए कहा कि इस पर व्यापक सुनवाई की आवश्यकता है।
यह फैसला 2020 दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश मामले में दो आरोपियों को अंतरिम जमानत देते समय सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया कि क्या किसी आरोपी की लंबे समय तक जेल में बंदी और मुकदमे में देरी, यूएपीए में जमानत पर लागू सख्त कानूनी प्रतिबंधों से ऊपर मानी जा सकती है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह एक गंभीर संवैधानिक और कानूनी प्रश्न है, जिस पर बड़ी पीठ द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कई मामलों में आरोपियों को लंबे समय तक मुकदमे के पूरा होने का इंतजार करना पड़ता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन का मुद्दा उठता है।
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दिल्ली दंगों से जुड़े इस मामले में आरोपियों ने दलील दी थी कि वे लंबे समय से जेल में बंद हैं और मुकदमे की प्रक्रिया धीमी होने के कारण उन्हें राहत मिलनी चाहिए। अदालत ने अंतरिम जमानत देते हुए इस व्यापक कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के विचारार्थ भेज दिया।
यूएपीए कानून के तहत जमानत प्राप्त करना बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों को ध्यान में रखते हुए सख्त प्रावधान बनाए गए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भविष्य में यूएपीए मामलों में जमानत संबंधी कानूनी व्याख्या को प्रभावित कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी पीठ का फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
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