समकालीन भारत की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल और वरिष्ठ राजनयिक गोपालकृष्ण गांधी ने कहा कि आज देश में सार्वजनिक विमर्श पर “गुस्सा, प्रतिशोध और बदले की भावना” हावी हो गई है, जबकि क्षमा और आत्ममंथन जैसे मूल्य लगभग गायब हो चुके हैं। वह 15 जनवरी 2026 को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 19वें संस्करण में बोल रहे थे।
गोपालकृष्ण गांधी ने कहा कि आज देश का माहौल “माफी मांगने और बदले की मांग” से भरा हुआ है। उनके अनुसार, एक या दो पीढ़ी पहले भारत में ऐसा नहीं था। उन्होंने कहा, “आज भारत में प्रमुख भावना गुस्सा और पलटकर वार करने की है। विरोधी से लगभग हाथापाई पर उतर आने की मानसिकता एक सामान्य भावना बन चुकी है।”
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि अखबारों की भाषा भी इस बदलाव को दर्शाती है। “आज सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला शब्द ‘स्लैम’ है—‘ममता ने अमित शाह को घेरा’, ‘अमित शाह ने ममता पर हमला बोला’, ‘टीएमसी ने कांग्रेस को घेरा’, ‘कांग्रेस ने भाजपा पर निशाना साधा’। अगर ‘स्लैम’ कोई बिकने वाली चीज होती, तो यह आज सबसे तेजी से बिकने वाला उत्पाद होता,” उन्होंने कहा, जिस पर श्रोताओं ने तालियां बजाईं।
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गांधी ने चेतावनी दी कि “नफरत और बदले की भावना आपस में जुड़ी हुई हैं” और आज जनमत के बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाली वस्तु घृणा और द्वेष बन गई है। उन्होंने कहा कि ‘बदला’ शब्द आम बोलचाल का हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसके साथ ही ईमानदारी, माफी और क्षमा जैसे मूल्यों का लोप हो गया है।
उन्होंने सवाल किया, “आखिरी बार हमने कब किसी को यह कहते सुना कि ‘मुझसे गलती हो गई’? या यह कहते सुना कि ‘मैं तुम्हें माफ करता हूं’?” उनके अनुसार आज क्षमा को भोलेपन और कमजोरी के रूप में देखा जाता है।
इतिहास का हवाला देते हुए, महात्मा गांधी और सी. राजगोपालाचारी के पौत्र गोपालकृष्ण गांधी ने कहा कि माफी और प्रायश्चित कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति के प्रतीक हैं। उन्होंने सम्राट अशोक, ऑस्ट्रेलिया और जापान के प्रधानमंत्रियों तथा जर्मनी के चांसलर विली ब्रांट के उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि ऐसे गुण आज न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में कम होते जा रहे हैं।
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