बिहार के मधुबनी जिले की 57 वर्षीय वकील अनीता झा पिछले 13 वर्षों से अपनी कार की पिछली सीट को ही अपना चैंबर बनाए हुए हैं। जिला अदालत परिसर में महिलाओं के लिए आवंटित चैंबर पुरुष वरिष्ठ वकीलों को दे दिए जाने के बाद, अनीता झा के पास अपने पेशे को जारी रखने के लिए यही एकमात्र विकल्प बचा।
ठंडी जनवरी की सुबह करीब 10.30 बजे एक सफेद हैचबैक कार मधुबनी जिला अदालत परिसर में जेल वैन के पास अपनी तय जगह पर आकर रुकती है। इंजन बंद होने से पहले ही वहां मौजूद लोग आगे बढ़ आते हैं। यह लोग कोई और नहीं, बल्कि अनीता झा के मुवक्किल हैं। कार के भीतर टाटा टियागो की पिछली सीट पर बैठी अनीता झा पूरी गंभीरता से अपने काम में जुट जाती हैं।
अनीता झा कहती हैं, “मेरा कोई घर नहीं है। मेरे पास जो कुछ भी है, वह इसी कार में है—मेरा काम, मेरी पहचान, सब कुछ।” यह कार ही उनका दफ्तर है, जहां वह केस से जुड़े दस्तावेज देखती हैं, मुवक्किलों से बात करती हैं और कानूनी सलाह देती हैं।
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दिनभर लोग आते-जाते रहते हैं, मौसम बदलता रहता है, लेकिन एक बात जो नहीं बदली, वह है अदालत के हर कार्यदिवस में अनीता झा का अपनी कार से आना और उसी के भीतर बैठकर अपनी जिम्मेदारियां निभाना। अदालत परिसर की भीड़ और शोर के बीच यह कार उनके लिए एक चलता-फिरता सुरक्षित स्थान बन चुकी है।
अनीता झा की यह कहानी न केवल संघर्ष की मिसाल है, बल्कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों और समान अवसरों पर भी सवाल खड़े करती है। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका समर्पण और आत्मसम्मान उन्हें असाधारण बनाता है।
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