बांग्लादेश 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस बार चुनावी मैदान में देश की प्रमुख सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग (एएल) मौजूद नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली इस पार्टी पर बड़े जनआंदोलन के बाद कार्रवाई हुई थी, जिसके चलते पार्टी को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है। यह स्थिति देश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही है।
अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। अब चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी के बीच केंद्रित हो गया है, जो पहले अवामी लीग के प्रमुख विरोधी रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अवामी लीग की अनुपस्थिति चुनाव परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकती है।
70 वर्षीय अबू बक्कर जैसे लाखों समर्थकों के लिए यह चुनाव बेहद भावनात्मक है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में हमेशा अवामी लीग के “नाव” चुनाव चिह्न को ही वोट दिया है और कभी कल्पना नहीं की थी कि ऐसा चुनाव आएगा जिसमें यह पार्टी शामिल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है, फिर भी वे वोट डालने जाएंगे, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि अगला चुनाव देखने का अवसर मिलेगा या नहीं।
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विश्लेषकों का कहना है कि अवामी लीग की गैरमौजूदगी से मतदाताओं के बीच भ्रम और अनिश्चितता का माहौल है। कई समर्थक अब यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि किस पार्टी को वोट दें। इससे मतदान पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
यह चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है, जिसमें पुराने समीकरण टूटते और नए गठबंधन बनते दिखाई दे सकते हैं। आने वाले परिणाम देश की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
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