दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि फुटपाथ पर सोना किसी भी स्थिति में दुर्घटना का शिकार हुए व्यक्ति की लापरवाही नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई वाहन चालक फुटपाथ पर वाहन चढ़ा देता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी उसी की होगी। इसी आधार पर न्यायालय ने सड़क दुर्घटना में मृतकों के परिजनों और घायल पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे में बढ़ोतरी का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति अनिश दयाल ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें दो मृतकों के परिजनों और दो घायल पीड़ितों के मुआवजे में 50 प्रतिशत की कटौती यह कहते हुए की गई थी कि पीड़ितों की भी दुर्घटना में "सहयोगी लापरवाही" (कॉन्ट्रिब्यूटरी नेग्लिजेंस) थी।
अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यदि मजबूरी में फुटपाथ पर चल रहा हो, खड़ा हो या विश्राम कर रहा हो, तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि कोई तेज रफ्तार वाहन फुटपाथ पर चढ़ आएगा। न्यायालय ने कहा कि फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए बनाए जाते हैं और वाहन चालकों का दायित्व है कि वे ऐसे क्षेत्रों में विशेष सावधानी बरतें।
और पढ़ें: मेदांता अस्पताल से आज छुट्टी मिलेगी सोनम वांगचुक को, लद्दाख लौटने से पहले राजघाट जाकर देंगे महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि
अपने 8 जुलाई के फैसले में अदालत ने कहा कि देश में अनेक लोग बेघर हैं, रातभर काम करते हैं या निर्माण स्थलों पर मजदूरी करते हैं। ऐसे लोगों के लिए फुटपाथ अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान बन जाते हैं। यदि वे वहां सोते हैं तो इसे उनकी लापरवाही नहीं कहा जा सकता। भले ही फुटपाथ का उपयोग उसके मूल उद्देश्य से अलग तरीके से किया गया हो, लेकिन कानून के अनुसार वहां वाहन चलाना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
यह दुर्घटना अक्टूबर 2015 में सुबह लगभग साढ़े चार बजे मादीपुर मेट्रो स्टेशन के नीचे हुई थी, जब तेज रफ्तार ट्रक फुटपाथ पर सो रहे चार लोगों को कुचलते हुए निकल गया। अदालत ने बीमा कंपनी को छह सप्ताह के भीतर संशोधित मुआवजा देने का निर्देश दिया।
और पढ़ें: कर्नाटक में कैबिनेट विस्तार की अटकलें तेज, दिल्ली दौरे पर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार