ग्रीनलैंड पर “कब्ज़ा” करने संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणी के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड के वॉशिंगटन स्थित दूतों ने अमेरिकी प्रशासन और सांसदों से संपर्क तेज कर दिया है। दोनों देशों के प्रतिनिधि इस प्रयास में लगे हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने बयान और संभावित कदमों से पीछे हटें।
डेनमार्क के राजदूत जेस्पर मोलर सोरेन्सन और ग्रीनलैंड के वॉशिंगटन स्थित मुख्य प्रतिनिधि जैकब इस्बोसेथसन ने गुरुवार (8 जनवरी, 2026) को व्हाइट हाउस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अधिकारियों से मुलाकात की। डेनिश सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस बैठक में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को हासिल करने की नई कोशिशों पर चर्चा हुई, जिसमें सैन्य बल के इस्तेमाल की संभावना तक जताई गई है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इस बैठक पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।
इन दूतों ने इस सप्ताह अमेरिकी सांसदों के साथ भी कई बैठकें की हैं, ताकि ट्रंप को अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए राजी किया जा सके। वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के अगले सप्ताह डेनमार्क के अधिकारियों से मुलाकात करने की उम्मीद है।
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एक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को केवल सैन्य ठिकानों के उपयोग तक सीमित रहने के बजाय पूरे ग्रीनलैंड का स्वामित्व चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वामित्व से वे अधिकार मिलते हैं, जो केवल समझौते या संधि से संभव नहीं हैं। गौरतलब है कि 1951 की एक संधि के तहत अमेरिका को डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सहमति से वहां सैन्य अड्डे स्थापित करने का अधिकार पहले से प्राप्त है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने यूरोपीय नेताओं से इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की अपील की और इसे सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने डेनमार्क पर ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप भी लगाया।
ग्रीनलैंड, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आर्कटिक सर्कल के भीतर है, करीब 56,000 लोगों का घर है, जिनमें अधिकांश इनुइट समुदाय से हैं। ग्रीनलैंड के नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे आत्मनिर्णय और सम्मान पर आधारित सहयोग चाहते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने “सबसे ताकतवर का कानून” कहकर आलोचना की और दुनिया में बढ़ती अस्थिरता पर चिंता जताई।
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