लेबनान पश्चिम एशिया का एक छोटा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण देश है, जिसकी सीमाएं भूमध्य सागर, सीरिया और इज़रायल से जुड़ी हैं। वर्ष 1943 में स्वतंत्र राष्ट्र बनने से पहले यह ऑटोमन साम्राज्य और बाद में फ्रांस के अधीन रहा। कभी इसे “मध्य पूर्व का स्विट्ज़रलैंड” कहा जाता था, लेकिन लंबे गृहयुद्ध ने इसकी अर्थव्यवस्था और स्थिरता को गहरा नुकसान पहुंचाया।
हिज़्बुल्लाह का उदय 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में ईरान में नई सरकार बनी, जिसका प्रभाव पूरे मुस्लिम जगत में पड़ा। 1982 में इज़रायल ने लेबनान पर सैन्य हमला किया और फलस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ अभियान चलाया। इसी दौरान लेबनान के शिया समुदायों को संगठित कर ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने उन्हें प्रशिक्षण, हथियार और वित्तीय सहायता दी, जिससे हिज़्बुल्लाह का गठन हुआ।
“हिज़्बुल्लाह” का अर्थ होता है “अल्लाह की पार्टी”। समय के साथ यह संगठन केवल एक मिलिशिया नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक ताकत के रूप में भी उभरा। वर्ष 1992 में इसने लेबनान की राजनीति में प्रवेश किया और 2022 के चुनावों के बाद इसकी 13 सीटें संसद में हैं।
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हिज़्बुल्लाह को कई देश, जैसे अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन, आतंकवादी संगठन मानते हैं, जबकि कुछ देश और समूह इसे “प्रतिरोध शक्ति” के रूप में देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक तौर पर आतंकवादी सूची में शामिल नहीं किया है।
यह संगठन केवल सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भी सक्रिय है। इसके तहत अल-मेहदी स्कूल नेटवर्क और स्वास्थ्य संस्थाएं अस्पताल, क्लीनिक और एम्बुलेंस सेवाएं प्रदान करती हैं।
लेबनान की राजनीति बेहद जटिल है, जहां राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद अध्यक्ष शिया मुस्लिम होता है। हिज़्बुल्लाह और इज़रायल के बीच लंबे समय से संघर्ष जारी है, जिसमें 2006 की जंग और 2024 में नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद संगठन सक्रिय बना हुआ है।
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