नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की नई रिपोर्ट ने दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की योजनाओं के सामने यूरेनियम आपूर्ति से जुड़ी बड़ी चुनौती की ओर इशारा किया है। एजेंसी की वार्षिक "न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी रिव्यू 2026" के मुताबिक मौजूदा खदानों से यूरेनियम उत्पादन में आने वाले वर्षों में भारी गिरावट आने की आशंका है, जबकि परमाणु ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में परमाणु ऊर्जा की महत्वाकांक्षाओं और उसके लिए जरूरी खनन व ईंधन प्रसंस्करण ढांचे के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है। IAEA ने अपनी समीक्षा में स्पष्ट रूप से कहा, "भविष्य में यूरेनियम की जरूरतों के दोगुना होने के उलट, मौजूदा खदानों से यूरेनियम उत्पादन 2040 तक कम से कम 50 प्रतिशत घटने का अनुमान है।"
यह रिपोर्ट वर्ष 2025 के दौरान परमाणु प्रौद्योगिकी क्षेत्र में हुए प्रमुख घटनाक्रमों की समीक्षा करती है। इसमें OECD की न्यूक्लियर एनर्जी एजेंसी और IAEA की "यूरेनियम 2024: रिसोर्सेज, प्रोडक्शन एंड डिमांड" रिपोर्ट के अनुमानों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2050 तक वैश्विक यूरेनियम आवश्यकताएं 50 से 144 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। इसके अनुसार, वर्तमान में लगभग 60,000 टन के आधार स्तर की तुलना में 2050 तक वार्षिक यूरेनियम आवश्यकता 90,045 टन से लेकर 1,42,631 टन तक पहुंच सकती है।
और पढ़ें: ईरान के नए रक्षा मंत्री अखलाघी की चेतावनी: ट्रंप हमला करें तो सैनिक बॉडी बैग में लौटेंगे
रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यूरेनियम आपूर्ति बढ़ाना आसान नहीं होगा, क्योंकि नई खदानें विकसित करने के लिए बड़े निवेश और लंबे समय की जरूरत होती है। IAEA ने कहा, "भविष्य में आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नई खदानों, मौजूदा खदानों के विस्तार या उनकी आयु बढ़ाने, तथा बंद पड़ी खदानों को फिर से शुरू करने की जरूरत होगी।" रिपोर्ट के मुताबिक, किसी नए यूरेनियम भंडार की खोज से लेकर खनन कार्य शुरू होने तक आमतौर पर 10 से 15 साल का समय लगता है।
चुनौतियां केवल यूरेनियम खनन तक सीमित नहीं हैं। IAEA ने परमाणु ईंधन प्रसंस्करण के लिए जरूरी ढांचे पर भी बढ़ते दबाव की चेतावनी दी है। रिपोर्ट में कहा गया, "वैश्विक परमाणु ईंधन आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ता असंतुलन देखा जा रहा है। रूपांतरण (कन्वर्जन) क्षमता पहले से ही अपर्याप्त है और 2040 तक मांग से और पीछे रहने का अनुमान है।" एजेंसी ने यह भी बताया कि हालांकि वैश्विक यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) क्षमता फिलहाल मांग से अधिक है, लेकिन यह विभिन्न देशों में असमान रूप से वितरित है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला संबंधी चिंताएं और बढ़ जाती हैं।
यह चुनौतियां ऐसे समय सामने आई हैं जब कई देश बढ़ती बिजली मांग पूरी करने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए परमाणु ऊर्जा की ओर रुख कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा सेंटरों के विस्तार ने भी विश्वसनीय बिजली स्रोत के रूप में परमाणु ऊर्जा में रुचि बढ़ाई है। IAEA के अनुसार, नए रिएक्टरों के निर्माण में तेजी लाने के लिए परमाणु उद्योग को वित्तपोषण, परियोजना लागत और नियामकीय चुनौतियों का समाधान करना होगा।
भारत, जिसने 2047 तक अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता 100 गीगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, के लिए यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला चुनौतियां विश्वसनीय ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक विस्तार के लिए जरूरी ढांचा विकसित करने के महत्व को रेखांकित करती हैं। रिपोर्ट बताती है कि भविष्य में परमाणु ऊर्जा विस्तार की गति न केवल रिएक्टरों के निर्माण पर, बल्कि यूरेनियम खनन, ईंधन प्रसंस्करण और सहायक ढांचे में समय पर निवेश पर भी निर्भर करेगी।
और पढ़ें: चेतेश्वर पुजारा बोले- T20 में संजू सैमसन के फॉर्म पर सवाल उठाना गलत, 'निरंतरता अत्यधिक महत्व दी जाती है'