भारतीय रेलवे ने अलग-अलग श्रेणियों में ट्रेन टिकटों के किराया निर्धारण की पद्धति (फॉर्मूला) को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है। रेलवे का कहना है कि किराया तय करने की प्रक्रिया “ट्रेड सीक्रेट” यानी व्यापारिक गोपनीयता के अंतर्गत आती है, इसलिए इसे सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई), 2005 के तहत साझा नहीं किया जा सकता।
यह मामला उस आरटीआई आवेदन से जुड़ा है, जिसमें भारतीय रेलवे से यह जानकारी मांगी गई थी कि विभिन्न श्रेणियों में ट्रेन टिकटों के बेस फेयर की गणना किस मानक पद्धति या किन मानदंडों के आधार पर की जाती है। आवेदनकर्ता ने यह भी जानना चाहा था कि क्या किराया तय करने के लिए कोई तयशुदा फॉर्मूला या गणितीय मॉडल अपनाया जाता है।
इस आरटीआई याचिका के जवाब में रेलवे के मुख्य जन सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने कहा कि किराया निर्धारण की वर्गीकरण प्रणाली और उसकी कार्यप्रणाली व्यापारिक गोपनीयता और बौद्धिक संपदा अधिकारों (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स) के दायरे में आती है। अधिकारी के अनुसार, इस तरह की जानकारी का खुलासा करना जनहित में उपयुक्त नहीं माना गया है।
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रेलवे का तर्क है कि किराया निर्धारण कई कारकों पर आधारित होता है, जिनमें परिचालन लागत, इंफ्रास्ट्रक्चर का रखरखाव, ऊर्जा खर्च, यात्रियों की श्रेणी, दूरी और सेवा की गुणवत्ता शामिल होती है। हालांकि, इन कारकों को किस अनुपात में और किस फॉर्मूले के तहत लागू किया जाता है, इसकी विस्तृत जानकारी साझा करने से रेलवे की व्यावसायिक रणनीति प्रभावित हो सकती है।
रेलवे के इस फैसले ने पारदर्शिता को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। आरटीआई कार्यकर्ताओं और यात्रियों के एक वर्ग का मानना है कि सार्वजनिक परिवहन सेवा होने के नाते रेलवे को किराया निर्धारण से जुड़ी बुनियादी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि यात्रियों को टिकट कीमतों में बढ़ोतरी या अंतर के कारणों की स्पष्ट समझ मिल सके।
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