ईरान और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत को फिलहाल कच्चे तेल की आपूर्ति में किसी तात्कालिक बाधा का सामना नहीं करना पड़ेगा। अधिकारियों और विश्लेषकों के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों के पास कम से कम 10 से 15 दिनों की कच्चे तेल की पर्याप्त इन्वेंट्री उपलब्ध है, जबकि ईंधन भंडार 7 से 10 दिनों की जरूरत पूरी कर सकते हैं।
दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य, से वैश्विक पेट्रोलियम तरल पदार्थों का लगभग 20 प्रतिशत और एलएनजी आपूर्ति का करीब पांचवां हिस्सा गुजरता है। भारत के लगभग 50 प्रतिशत कच्चे तेल आयात — करीब 25 से 27 लाख बैरल प्रतिदिन — इसी मार्ग से आते हैं, जिनमें इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत प्रमुख स्रोत हैं।
ईरानी सरकार ने 28 फरवरी को दावा किया कि अमेरिकी और इज़राइली हमलों के जवाब में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह बंदी लंबी नहीं चलेगी, क्योंकि इससे सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को भी आर्थिक नुकसान होगा।
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ब्रेंट कच्चा तेल इस वर्ष अब तक 12 डॉलर प्रति बैरल से अधिक बढ़ चुका है और हाल में 73 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। विश्लेषकों के अनुसार यदि आपूर्ति पर गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ तो कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।
भारत ने हाल के वर्षों में अपने आयात स्रोतों में विविधता लाई है। रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी तेल आयात किया जा सकता है। हालांकि रूस से आने वाले जहाजों को भारत पहुंचने में लगभग एक महीना लगता है, जबकि खाड़ी देशों से आपूर्ति 5 से 7 दिनों में हो जाती है।
एलएनजी और एलपीजी आपूर्ति पर लंबी बंदी का अधिक असर पड़ सकता है, क्योंकि इनके अधिकांश अनुबंध दीर्घकालिक होते हैं और स्पॉट बाजार में सीमित मात्रा उपलब्ध रहती है।
सरकार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल सबसे बड़ा खतरा भौतिक आपूर्ति संकट नहीं, बल्कि कीमतों में अस्थिरता और उसके कारण महंगाई तथा चालू खाते के घाटे पर पड़ने वाला दबाव है।
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