ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने देश की सैन्य और कूटनीतिक निर्णय प्रक्रिया पर प्रभावी नियंत्रण हासिल कर लिया है, जिससे मध्यमार्गी नेताओं की भूमिका काफी सीमित हो गई है। यह जानकारी एक रिपोर्ट में क्षेत्रीय विश्लेषकों के हवाले से दी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडर अहमद वहीदी और उनके सहयोगियों ने बीते सप्ताह के दौरान सत्ता के प्रमुख केंद्रों पर पकड़ मजबूत कर ली है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ रहा है और ईरान ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित युद्धविराम वार्ता को दरकिनार कर दिया है।
मध्यमार्गी नेताओं की भूमिका कम हुई है। वॉशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के अनुसार, विदेश मंत्री अब्बास अराघची जैसे नेताओं को किनारे कर दिया गया है। अराघची ने अमेरिका के साथ बातचीत के बाद जलडमरूमध्य खोलने की बात कही थी, लेकिन आईआरजीसी ने इसे खारिज कर दिया।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि मोहम्मद बगेर ज़ोलघाद्र, जो ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव हैं, ने भी आईआरजीसी का समर्थन किया है। इससे अहमद वहीदी की रणनीतिक और सैन्य फैसलों पर पकड़ और मजबूत हो गई है।
आईआरजीसी ने हाल ही में क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है और तेज़ हमलावर नौकाओं पर निर्भरता बढ़ाई है। रिपोर्ट के अनुसार, जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कई जहाजों पर हमले के बाद सैकड़ों जहाज खाड़ी में फंसे हुए हैं।
ज़ोलघाद्र की भूमिका कूटनीतिक वार्ताओं तक भी पहुंच गई है, जहां उन्हें वार्ता दल में शामिल किया गया ताकि आईआरजीसी के निर्देशों का पालन सुनिश्चित हो सके। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आंतरिक मतभेदों के कारण वार्ता दल को तेहरान वापस बुला लिया गया।
विश्लेषकों का मानना है कि इस सत्ता परिवर्तन के बाद पश्चिमी देशों के साथ बातचीत की संभावनाएं और कम हो गई हैं, जिससे युद्धविराम की स्थिरता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
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