मध्य पूर्व में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की मौत के बाद, इज़राइल ने रिपोर्ट किया कि सालों तक तेहरान के ट्रैफिक कैमरे और मोबाइल नेटवर्क हैक कर उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी। इस योजना का उद्देश्य ईरान के सर्वोच्च नेता और सेना के शीर्ष अधिकारियों को टारगेटेड स्ट्राइक के माध्यम से हटाना था।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग सभी ट्रैफिक कैमरे हैक किए गए थे। फुटेज एन्क्रिप्टेड कर सर्वरों पर ट्रांसमिट किया जाता था। इस साइबर निगरानी के जरिए इज़राइल और अमेरिकी बलों ने खामेनेई और उनके सुरक्षा दल की लोकेशन का सटीक पता लगाया, जिससे उनका टारगेटेड स्ट्राइक में सफाया संभव हो सका।
इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस हमले को जायज़ ठहराया। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ईरानी इस्लामिस्ट शासन अमेरिका को नष्ट करने के लिए प्रतिबद्ध था। नेतन्याहू ने कहा, “ईरान पिछले 47 साल से अमेरिका के खिलाफ रहा है। उन्होंने अमेरिकी दूतावासों पर हमले किए, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मारने की कोशिश की और वैश्विक आतंक का जाल फैलाया।”
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अमेरिकी उप राष्ट्रपति जे.डी. वैंस ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप चाहते थे कि ईरान कभी परमाणु हथियार न बना पाए। वैंस ने कहा कि ट्रंप ने देखा कि ईरानी शासन कमजोर हुआ और परमाणु हथियार की सीमा पर था, इसलिए सुरक्षा के लिए कार्रवाई करना आवश्यक था।
अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो ने भी कहा कि ईरान की वर्तमान प्रतिशोध की लहर यह दर्शाती है कि यदि हमला न किया जाता तो ईरान भविष्य में अत्यधिक मिसाइल और ड्रोन क्षमता हासिल कर चुका होता।
इस रिपोर्ट से यह स्पष्ट हुआ कि इज़राइल और अमेरिका ने लंबे समय तक रणनीतिक साइबर निगरानी के जरिए ईरानी नेतृत्व को ट्रैक किया और उसे सीमित करने की योजना बनाई थी।
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