26 अगस्त 1957 को मॉस्को ने दुनिया को चौंकाते हुए पहली सफल अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल यानी आईसीबीएम के परीक्षण की घोषणा की। इस उपलब्धि ने यह संकेत दिया कि सोवियत संघ हजारों किलोमीटर दूर स्थित किसी भी लक्ष्य तक परमाणु हथियार पहुंचाने में सक्षम हो सकता है। इससे शीतयुद्ध के दौरान वैश्विक सुरक्षा और सैन्य रणनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ अत्याधुनिक रॉकेट तकनीक में बढ़त हासिल करने की होड़ में जुट गए थे। दोनों महाशक्तियां जर्मन रॉकेट तकनीक और विशेषज्ञों की मदद लेकर अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर रही थीं। उनका लक्ष्य ऐसी बहु-चरणीय मिसाइल विकसित करना था, जो भारी परमाणु हथियार को हजारों किलोमीटर दूर तक सटीकता से पहुंचा सके।
अमेरिका की विफलता के बाद सोवियत सफलता
सोवियत घोषणा से लगभग एक महीने पहले अमेरिका ने अपनी आईसीबीएम ‘एटलस’ का परीक्षण किया था। इसे करीब 5,000 मील तक उड़ने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन परीक्षण के दौरान मिसाइल नियंत्रण खो बैठी और विफल हो गई।
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इसके बाद सोवियत संघ ने अपनी बहु-चरणीय मिसाइल के सफल परीक्षण की घोषणा की। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने इसकी सटीकता को लेकर सवाल उठाए, लेकिन इसका रणनीतिक प्रभाव बेहद बड़ा था।
सोवियत संघ पहले ही परमाणु और हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर चुका था। अब लंबी दूरी तक हथियार पहुंचाने की क्षमता मिलने से अमेरिका की मुख्य भूमि भी संभावित खतरे के दायरे में आ गई।
मिसाइल से शुरू हुई अंतरिक्ष दौड़
आईसीबीएम तकनीक ने आगे चलकर अंतरिक्ष कार्यक्रमों को भी गति दी। भारी रॉकेट और कक्षीय प्रक्षेपण यान कई समान तकनीकों पर आधारित थे। इसी क्षमता का इस्तेमाल करते हुए सोवियत संघ ने दो महीने से भी कम समय बाद स्पुतनिक लॉन्च किया, जो दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह बना।
इस तरह 1957 की मिसाइल उपलब्धि ने न केवल युद्ध की रणनीति बदली, बल्कि अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष की होड़ को भी तेज कर दिया। हजारों किलोमीटर की दूरी और महासागर अब महाशक्तियों के लिए सुरक्षा की गारंटी नहीं रह गए थे।
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