ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा ने शनिवार को स्पष्ट किया कि वह विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में शांति बांड पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उनकी याचिका खारिज किए जाने के एक दिन बाद उन्होंने यह बयान दिया। याचिका में उन्होंने पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें 10,000 रुपये के निजी मुचलके और एक जमानतदार की मांग की गई थी।
नेहा बोरा ने सवाल उठाया, “मुझसे किसकी शांति बनाए रखने को कहा जा रहा है?” उन्होंने कहा कि सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है। सरकार से सवाल पूछने और अपनी असहमति व्यक्त करने को शांति के लिए खतरा कैसे माना जा सकता है?
28 अक्टूबर तक देना होगा जवाब
पुलिस ने 17 अक्टूबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 के तहत नोटिस जारी किया था। इसमें नेहा बोरा को 19 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने और यह बताने को कहा गया था कि उनसे जांच की अवधि के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका और एक जमानतदार क्यों न मांगा जाए।
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दिल्ली हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद नेहा बोरा शनिवार को मंदिर मार्ग स्थित उपमंडलीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत पहुंचीं। मजिस्ट्रेट ने उन्हें नोटिस जारी करने से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए। हाईकोर्ट ने अधिकारियों को ये दस्तावेज देने का निर्देश दिया था। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को निर्धारित है और नेहा को उसी दिन तक नोटिस पर अपना जवाब दाखिल करना है।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार जरूरी
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के संसदीय कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान नेहा ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना और विरोध दर्ज कराना मौलिक अधिकार हैं। उन्होंने पूछा कि यदि सरकार से सवाल ही नहीं पूछे जाएंगे, तो किसकी शांति बनाए रखी जाएगी?
नेहा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी आंदोलन का भी जिक्र किया। यह विरोध मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं को लेकर उनके इस्तीफे की मांग से जुड़ा है।
नेहा को 16 अक्टूबर को राजधानी में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। अगले दिन उन्हें नोटिस जारी किया गया। उन्होंने पहले भी आरोप लगाया था कि ऐसी निवारक कार्रवाई शांतिपूर्ण विरोध को दबाने का प्रयास है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक असहमति को सार्वजनिक व्यवस्था के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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