साल 2025 ने दुनिया को एक बुनियादी सच्चाई फिर से याद दिलाई—संघर्ष अब सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। किसी एक क्षेत्र में छिड़ा युद्ध महाद्वीपों में पलायन बढ़ाता है, खाद्य और ऊर्जा बाजारों को प्रभावित करता है, मानवीय प्रणालियों पर दबाव डालता है और वैश्विक गठबंधनों को नया आकार देता है। युद्धक्षेत्र भले ही स्थानीय हो, लेकिन उसके झटके वैश्विक होते हैं।
ऐसे माहौल में नॉर्वे और क़तर जैसे दो छोटे देशों ने मध्यस्थता को केवल सद्भावना का माध्यम नहीं, बल्कि सुरक्षा नीति का मुख्य औज़ार बनाया है। दोनों देशों के लिए कूटनीति कोई औपचारिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ज़िम्मेदारी है। स्थिरता तभी आती है जब संवाद के रास्ते खुले रहें और विरोधी पक्षों को राजनीतिक बातचीत में जोड़े रखा जाए, भले ही आपसी विश्वास टूट चुका हो।
2026 की ओर बढ़ते हुए, दुनिया को अब अव्यवस्था को सामान्य मानने की बजाय शांति को सामान्य बनाना होगा। मध्यस्थता अब केवल नैतिक विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है—जो टकराव के बढ़ने से पहले ही उसे रोक सकती है।
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ग़ाज़ा, सूडान, ग्रेट लेक्स क्षेत्र, साहेल और कोलंबिया जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि प्रभावी मध्यस्थता बड़े कूटनीतिक विजय नहीं, बल्कि लगातार और अनुशासित प्रयासों से संभव होती है। ग़ाज़ा में कर राशि की रिहाई, क़ैदियों और बंधकों की वापसी तथा मानवीय सहायता में सुधार—ये सब संवाद के ज़रिये संभव हुआ।
लेख में ज़ोर दिया गया है कि संकट प्रबंधन से आगे बढ़कर संकट की रोकथाम ज़रूरी है। इसके लिए पाँच बातें अहम हैं—समय रहते मध्यस्थता में निवेश, अंतरराष्ट्रीय क़ानून का पालन, मानवीय सहायता तक निर्बाध पहुंच, युद्धविराम की निगरानी और मध्यस्थों की सुरक्षा।
नॉर्वे और क़तर का संदेश साफ़ है: 2026 का संकल्प यही होना चाहिए कि अव्यवस्था हमें ढूंढे, उससे पहले हम शांति को चुनें। मध्यस्थता असफलता के बाद का उपाय नहीं, बल्कि असफलता को रोकने का साधन है।
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