सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में दस्तावेजों के सत्यापन और अंतिम मतदाता सूची (Final Electoral Roll) के प्रकाशन की समयसीमा 14 फरवरी से बढ़ाकर 21 फरवरी कर दी। इस दौरान कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को नोटिस जारी किया और व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने शिकायतों के आधार पर हिंसा और अधिकारियों को धमकाने के मामलों में जवाब देने के लिए भी शॉ-कार्न नोटिस जारी किया।
सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट SIR प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की बाधा बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि सुधार की जरूरत होने पर आदेश जारी किए जाएंगे, लेकिन किसी भी तरह की रुकावट स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने सभी राज्यों को इसे समझने की चेतावनी दी।
अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी ने कहा कि चुनाव आयोग ने कभी राज्य से अधिकारियों के नाम नहीं मांगे। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कोर्ट को बताया कि 8,500 अधिकारियों की सूची अब प्रस्तुत की गई है। सीजेआई ने सूची में अधिकारियों के नाम, पद और पदस्थापन स्थल के बारे में पूछा और पूछा कि अधिकारी अगले दिन संबंधित निर्वाचन अधिकारी (ERO) को रिपोर्ट कर पाएंगे या नहीं।
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चर्चा के दौरान मतदाता मैपिंग और तार्किक विसंगतियों पर भी सवाल उठाए गए। दीवान ने बताया कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी (LD) श्रेणी की 50% से अधिक त्रुटियां मामूली वर्तनी गलतियों के कारण हैं।
सीजेआई ने कोर्ट कक्ष में अनुशासन बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा, “यह कोर्ट नंबर 1 है, बाजार नहीं।”
अधिवक्ता दीवान ने बताया कि प्रारंभिक मतदाता सूची में लगभग 7.08 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 6.75 करोड़ पहले ही पहचान किए जा चुके हैं, जबकि लगभग 32 लाख मतदाता अभी पहचान के इंतजार में हैं।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
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