अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी न्याय विभाग के बीच हुए 10 अरब डॉलर के विवादास्पद समझौते पर कानूनी विवाद गहराता जा रहा है। फ्लोरिडा की एक संघीय न्यायाधीश ने संकेत दिया है कि वह इस समझौते की गहन जांच करेंगी, क्योंकि इस पर मिलीभगत और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
अमेरिकी जिला न्यायाधीश कैथलीन विलियम्स ने ट्रंप की कानूनी टीम को 12 जून तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 35 सेवानिवृत्त संघीय न्यायाधीशों द्वारा दायर एक याचिका के बाद आया है, जिसमें दावा किया गया है कि यह समझौता "मिलीभगत और अदालत को गुमराह करने" का परिणाम है।
दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कर रिकॉर्ड के कथित गलत प्रबंधन और मीडिया में लीक होने को लेकर अमेरिकी आंतरिक राजस्व सेवा (आईआरएस) के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। बाद में यह मामला एक समझौते के जरिए सुलझा लिया गया। समझौते में उन लोगों के लिए लगभग 1.8 अरब डॉलर का मुआवजा कोष बनाने का प्रस्ताव रखा गया था, जो स्वयं को राजनीतिक प्रताड़ना या "वेपनाइजेशन" का शिकार मानते हैं।
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समझौते के बाद ट्रंप ने मुकदमा वापस लेने का अनुरोध किया था, जिसे न्यायाधीश विलियम्स ने 18 मई को स्वीकार कर लिया था। हालांकि अब उन्होंने कहा है कि अदालत के पास समझौते से जुड़े संभावित दुराचार की जांच करने का अधिकार बना हुआ है।
याचिका में कहा गया है कि यह समझौता कभी औपचारिक रूप से अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया और इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। यदि अदालत मामले को दोबारा खोलती है तो सुनवाई आयोजित की जा सकती है।
इसी बीच वर्जीनिया की अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियोनी ब्रिंकेमा ने ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित "एंटी-वेपनाइजेशन फंड" के गठन पर अस्थायी रोक लगा दी है। यह रोक कम से कम 12 जून तक प्रभावी रहेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते में आईआरएस को ट्रंप, उनके रिश्तेदारों और उनकी कंपनियों के पुराने कर मामलों की जांच से रोकने जैसी असामान्य शर्तें शामिल हैं। यही कारण है कि यह मामला अब अमेरिका में कानूनी और राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन गया है।
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