ब्रिटेन में आगामी बजट से पहले जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार देश की बेरोजगारी दर में गिरावट देखी गई है, जिसे सरकार के लिए एक राहत भरी खबर माना जा रहा है। हालांकि इसी दौरान कंपनियों द्वारा रिक्त पदों की संख्या में लगातार कटौती किए जाने से ब्रिटेन का श्रम बाजार 'नौकरियों के सूखे' यानी 'जॉब्स ड्राउट' के दौर से गुजर रहा है।
लर्निंग एंड वर्क इंस्टीट्यूट (L&W) के मुख्य कार्यकारी स्टीफन इवांस ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि समग्र रूप से श्रम बाजार अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। उन्होंने कहा, "वैश्विक घटनाओं से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद यह लचीलापन स्वागत योग्य है। लेकिन अंतर्निहित समस्याएं बनी हुई हैं, जिसमें लगभग दस लाख युवा न तो शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न ही किसी प्रशिक्षण में। साथ ही कुल रोजगार सरकार के 80 प्रतिशत रोजगार दर के लक्ष्य से बीस लाख से अधिक कम है।"
स्टीफन इवांस के अनुसार इन चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी है कि लाभ प्रणाली (बेनिफिट सिस्टम) में बदलाव किया जाए, ताकि यह हर जरूरतमंद व्यक्ति को सक्रिय सहायता प्रदान कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि इसके साथ ही नियोक्ताओं के लिए नौकरियां सृजित करना आसान बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
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गौरतलब है कि यह आंकड़े ऐसे समय पर सामने आए हैं जब ब्रिटेन सरकार आगामी बजट की तैयारी कर रही है, जिसमें रोजगार सृजन और आर्थिक सुधार से जुड़े कई अहम फैसले लिए जा सकते हैं। बेरोजगारी दर में गिरावट को अल्पकालिक राहत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कंपनियां रिक्तियां घटाना बंद नहीं करतीं, तब तक श्रम बाजार में वास्तविक सुधार नहीं आ सकता।
विशेष रूप से युवाओं की स्थिति को लेकर चिंता जताई जा रही है, क्योंकि बड़ी संख्या में युवा न तो शिक्षा हासिल कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी कौशल विकास कार्यक्रम का हिस्सा हैं। यह आंकड़ा सरकार के लिए एक गंभीर नीतिगत चुनौती प्रस्तुत करता है, क्योंकि 80 प्रतिशत रोजगार दर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच ब्रिटेन का श्रम बाजार भले ही पूरी तरह से नहीं टूटा हो, लेकिन इसमें संरचनात्मक सुधारों की सख्त जरूरत है। आगामी बजट में सरकार किस तरह की नीतियां पेश करती है, इस पर रोजगार बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
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