अमेरिका वैश्विक सहयोग से और पीछे हटते हुए 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों और एजेंसियों से बाहर निकलने जा रहा है। इनमें से अधिकांश संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से जुड़े निकाय, आयोग और सलाहकार पैनल हैं, जो जलवायु, श्रम और सामाजिक मुद्दों पर काम करते हैं। ट्रंप प्रशासन ने इन संस्थाओं को विविधता और “वोक” पहल को बढ़ावा देने वाला बताते हुए निशाना बनाया है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार, 7 जनवरी 2026 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत 66 संगठनों, एजेंसियों और आयोगों के लिए अमेरिकी समर्थन निलंबित किया गया। यह कदम प्रशासन द्वारा सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका की भागीदारी और फंडिंग की समीक्षा के निर्देश के बाद उठाया गया। एक अमेरिकी अधिकारी ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर इस निर्णय की पुष्टि की।
अमेरिकी विदेश विभाग ने बयान में कहा कि इन संस्थाओं का दायरा दोहराव वाला है, प्रबंधन कमजोर है, वे अनावश्यक और खर्चीली हैं, तथा कुछ मामलों में ऐसे हित समूहों के प्रभाव में हैं जो अमेरिका के राष्ट्रीय हितों, संप्रभुता और समृद्धि के खिलाफ हैं।
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अमेरिका भारत-फ्रांस के नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर एलायंस से भी बाहर निकल चुका है, जिसकी शुरुआत 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी।
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन की सैन्य कार्रवाइयों और कड़े रुख ने सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी देशों को समान रूप से चिंतित किया है। इससे पहले अमेरिका विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूएन मानवाधिकार परिषद, यूनेस्को और फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए यूएन एजेंसी UNRWA से भी समर्थन वापस ले चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर अमेरिका की भागीदारी के बिना ठोस प्रगति कठिन होगी, क्योंकि अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जकों और अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक रॉब जैक्सन के अनुसार, इस कदम से अन्य देशों को भी अपनी प्रतिबद्धताएं टालने का बहाना मिल सकता है।
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