अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक महत्वपूर्ण असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। इस समझौते को दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। हालांकि, इसके साथ ही यह समझौता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का विषय भी बन गया है, क्योंकि इससे भविष्य में सऊदी अरब को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) की अनुमति मिलने की संभावना जताई जा रही है।
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और उसे घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धन करने से रोकने के लिए सैन्य और कूटनीतिक प्रयासों में जुटा है। ऐसे में सऊदी अरब के साथ हुआ यह समझौता अमेरिका की परमाणु नीति को लेकर कई सवाल खड़े कर रहा है।
अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने जारी बयान में बताया कि ऊर्जा सचिव क्रिस राइट और सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअज़ीज़ बिन सलमान ने "शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग समझौते" और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, समझौते की विस्तृत शर्तों को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
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सऊदी अरब के साथ असैन्य परमाणु सहयोग पर कई वर्षों से बातचीत चल रही थी। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल और बाद में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन के दौरान भी इस दिशा में प्रयास किए गए थे। लेकिन परमाणु अप्रसार से जुड़े विशेषज्ञों और संगठनों ने लगातार चेतावनी दी थी कि इस तरह का समझौता भविष्य में सऊदी अरब के लिए परमाणु हथियार विकसित करने का रास्ता खोल सकता है।
अब इस समझौते को अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा। माना जा रहा है कि कई सांसद इसका विरोध कर सकते हैं। उनकी चिंता है कि यदि यूरेनियम संवर्धन पर कड़ी निगरानी और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था नहीं रही, तो इससे परमाणु अप्रसार व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।
सऊदी अरब पहले भी कह चुका है कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो वह भी अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा कदम उठा सकता है। हालांकि, ईरान लगातार परमाणु हथियार बनाने के आरोपों से इनकार करता रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका को यह भी आशंका रही कि यदि उसने सऊदी अरब की मांगें पूरी नहीं कीं, तो रियाद परमाणु तकनीक के लिए चीन या रूस का रुख कर सकता है।
अमेरिकी प्रशासन ने इस वर्ष कांग्रेस को दी गई रिपोर्ट में कहा था कि यह समझौता अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा करेगा और वैश्विक असैन्य परमाणु ऊर्जा बाजार में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका को मजबूत करेगा। ऊर्जा विभाग के अनुसार इससे अमेरिकी परमाणु तकनीक का निर्यात बढ़ेगा, उच्च वेतन वाले रोजगार सृजित होंगे तथा अमेरिका की ऊर्जा और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करेगा तथा परमाणु सुरक्षा और अप्रसार के सर्वोच्च मानकों का पालन करेगा। वहीं, वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डैन समनर ने इसे ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और आर्थिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस समझौते में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अतिरिक्त निगरानी प्रोटोकॉल जैसी सख्त व्यवस्था शामिल नहीं हो सकती, जो वर्ष 2015 के ईरान परमाणु समझौते का अहम हिस्सा थी।
इस बीच, डिफेंस प्रायोरिटीज़ के पश्चिम एशिया कार्यक्रम की प्रमुख रोज़मेरी केलैनिक ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर जारी संघर्ष के बीच सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन तकनीक उपलब्ध कराना बेहद जोखिमपूर्ण कदम है। उनके अनुसार इससे ईरान पर भी परमाणु हथियार विकसित करने का दबाव बढ़ सकता है और पश्चिम एशिया में हथियारों की नई दौड़ शुरू होने की आशंका पैदा हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के घटनाक्रमों के बीच सऊदी अरब और परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को लेकर भी चर्चाएं तेज हुई हैं। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर उनका देश सऊदी अरब के साथ अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा सहयोग करने पर विचार कर सकता है। इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और सुरक्षा समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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